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October 30, 2008

तमाशा शार्ट सेलिंग का: हेज फंडों को करारी मात

लंदन के अति समझदार हेज फंडों को जिस तरह उनकी बेतहाशा समझदारी के चलते, जर्मन कार कंपनी पोर्श ने 20 अरब डॉलर की करारी चोट दी है, उसकी वजह से हेज फंडों में मचे रोने-पीटने को सांत्वना देने का जिगर किसी में नहीं बचा है।

अधिकांश जर्मन इसे 'लालची' हेज फंडों पर जर्मन कार उद्योग की शानदार जीत के तौर पर महसूस कर रहे हैं जिनमें ज्यादातर पोर्श के ग्राहक हैं। हेज फंडों ने यह भारी रकम उस बाजार रणनीति की वजह से गंवाई, जिसे अभी तक बाजार में चांदी काटने का शानदार अल्पकालिक (शार्ट टर्म) तरीका समझा जाता रहा और जिसकी वजह से तमाम हेज फंडों को दुनिया भर में विद्रोही कमाऊ सपूतों की चमकदार छवि मिली। अब हाल यह है कि उनमें से अधिकांश को अपनी जान के लाले पड़ गए हैं। लीमैन ब्रदर्स के पतन और इसके बाद मचे विश्वव्यापी विकराल आर्थिक संकट की वजह से दुनिया भर की अनेक नामी-गिरामी वित्तीय संस्थाओं के लिए यह चोट, ताबूत की आखिरी कील की तरह है। लेकिन इस मसले को लेकर हेज फंडों के साथ सहानुभूति उनके अपने परिवार के सिवा और किसी की हो ही नहीं सकती।

अगर कार बनाने वाली नामी कंपनी पोर्श ने इसमें केंद्रीय भूमिका निभाई, जैसा कि उस पर आरोपों की झड़ी लगाई जा रही है, तो सम्भवत: यह बाजार से छेड़छाड़ का इसके भयंकर दुष्परिणामों समेत पहला सबसे बड़ा मामला माना जाएगा। हालांकि पोर्श ने इसे पूर्णतया कानूनी करार देते हुए इसमें कुछ भी गलत नहीं बताया है। जर्मन नियामक 'बाफिन' का मानना है कि अगर आंतरिक गड़बड़ी का कोई मामला पाया जाता है तो पूरे मामले की जांच कराई जा सकती है (हालांकि अभी तक जांच संबंधी कोई कार्यवाही किए जाने के संकेत नहीं हैं।) लेकिन बाफिन पोर्श के द्वारा कुछ भी गलत नहीं किए गए होने के दृष्टिकोण को स्वीकार कर रहा है। दूसरे शब्दों में, यह मामला ऐसा है कि इसमें पीड़ित हेज फंडों की करतूतों की समीक्षा की जानी चाहिए।

असल में सारा मामला जर्मनी की एक अन्य नामी कार कंपनी वॉक्सवैगन में हेज फंडों द्वारा शार्ट पोजीशन लिए जाने से शुरू हुआ था जबकि विश्वव्यापी मंदी के दौर में जर्मन कार कंपनियों के शेयर भी ओवरवैल्यूड देखे जा रहे थे और जिनका गिरना तय माना जा रहा था। अमेरिका में कार कंपनियों के शेयरों का भट्ठा बैठने के साथ दुनिया भर के मोटर निर्माता संकट में थे और पोर्श, अपनी मुख्य प्रतिद्वंदी, वॉक्सवैगन में अपनी हिस्सेदारी बढा़कर 50 फीसदी करने की इच्छा पहले ही जाहिर कर चुकी थी। ऐसे में वॉक्सवैगन के सामान्य शेयरों की बाजार में कमी करके हेज फंडों को अपनी विजय सुनिश्चित नजर आ रही थी। लेकिन डेरिवेटिव सौदों और ऑप्शन आदि के जरिए जिस तरह से पोर्श ने अपनी हिस्सेदारी गोपनीय रूप से तकरीबन 75 फीसदी कर ली, (जिसके कि 42.6 फीसदी के होने का अनुमान था) वही हेज फंडों के लिए प्राणघाती हो गया। 20 फीसदी की सरकारी हिस्सेदारी के बाद बाजार में वॉक्सवैगन के शेयरों का अकाल पड़ गया।

वॉक्सवैगन के शेयर गिरने की आशा में जर्मनी के पेंशन फंडों से शेयर उधार लेकर पोजीशन ले बैठे हेज फंडों पर गाज गिराते हुए, वॉक्सवैगन का शेयर राकेट की गति से बाजार में चढा़ और बाजार पूंजीकरण के मामले में एकाएक ही वॉक्सवैगन को संसार की सबसे बड़ी कंपनी बनाते हुए, जर्मनी के मुख्य सूचकांक डॉक्स' में शामिल हो गया। शुक्रवार को 210 पर बंद हुआ यह शेयर अगले कारोबारी दिन में 1005 का स्तर छूने के बाद 945 पर बंद हुआ। बाजार में केवल 6 फीसदी शेयर ही कारोबार के लिए उपलब्ध होने की वजह से यह जोरदार गर्मी आई। इस तरह हेज फंडों को किसी एक अकेली कंपनी के शेयरों में होने वाले सबसे बड़े घाटे का अलार्म बज गया।

इस साल की दूसरी छमाही में कुल 500 अरब का घाटा हेज फंडों को उनके द्वारा शार्ट सेलिंग पर भरोसा किए जाने के कारण होने का अनुमान मार्गन स्टेनले के विशेषज्ञों ने लगाया है। पिछले सप्ताह 50 फीसदी नीचे आए वॉक्सवैगन के शेयर के बारे में ज्यादातर लोगों के साथ जिस दौरान हेज फंड भी इस शेयर के जल्दी ही ध्वस्त होने के कयास लगा रहे थे, उसी दौरान पोर्श गुपचुप इसमें अपनी हिस्सेदारी मजबूत करते हुए करीब तीन चौथाई कर रही थी।(जबकि पिछले मार्च में इसने वॉक्सवैगन में अपना नियंत्रण 50 फीसदी से बढा़ने की बात को यह कहकर खारिज कर दिया था कि वॉक्सवैगन के शेयरहोल्डरों के ढांचे को देखते हुए, इसमें 75 फीसदी का नियंत्रण हासिल करने की संभावना न के बराबर है।) मौजूदा हालात में, कुल कार्यक्रम में सबसे बड़े फायदे में पोर्श रही है, जो अपने खिलाफ सभी आरोपों को हवा में उड़ा रही है।

आरोपों-प्रत्यारोपों का यह दौर लंबा चले या न चले, कई हेज फंडों को यह करारी चोट दिवालियेपन के कगार पर ला चुकी है। एक नजर शार्ट-सेलिंग के पहलूओं पर डालें कि शार्ट सेलिंग क्या है? दांव या असफलता?
-एक निवेशक शेयर या अन्य परिसम्पत्तियों को धारक से उधार लेता है।
-ये शेयर बाजार में इस उम्मीद में बेच दिए जाते हैं कि बाजार आगे और गिरेगा।
-शेयरों को वापस गिरी कीमतों पर खरीदने का लक्ष्य रखा जाता है। ऐसा करके उधार लिए गए शेयर मूल धारक को वापस लौटा दिए जाते हैं।
-अगर ट्रेडरों की बड़ी तादाद शेयरों की एक साथ शार्ट सेलिंग करती है, तो शेयर की कीमत गिरना तय होता है।
-एक ओवर-वैल्यूड शेयर के भाव को वाजिब कीमतों पर लाने में शार्ट-सेलिंग की अहम भूमिका होती है।


October 29, 2008

दिवाली से दिवाली तक सेंसेक्‍स

देश भर में दिवाली का पर्व मनाया जा रहा है। भगवान राम के 14 वर्ष के वनवास से अयोध्‍या लौटने की खुशी में दिवाली का पर्व मनाया जाता है। साथ ही धन की देवी लक्ष्‍मी की खास कृपा पाने के लिए आज उनकी विशेष पूजा अर्चना की जाती है। लेकिन शेयर बाजार के निवेशक काफी निराश है। उनके लिए दिवाली का पर्व खुशी की जगह मातम का पर्व बन गया है। जहां पिछली दिवाली पर बीएसई सेंसेक्‍स 20 हजार अंक के आसपास था, वहीं इस दिवाली पर यह 8500 अंक पर है।

दुनिया की आर्थिक नीति तय करने वाले देश अमरीका के वित्तीय संकट में फंसने से पिछले दस महीनों में दुनिया भर के शेयर बाजारों में गिरावट का दौर जारी है और अब इस मंदी को वर्ष 1929 की महामंदी के समान बताया जा रहा है। यह मंदी कहां जाकर ठहरेगी कोई नहीं जानता क्‍योंकि कई देशों की आर्थिक स्थिति तो इतनी डगमगा गई है कि वे दिवालिया होने के कगार पर खड़े हैं। समूचे देश इसके लिए जोरदार प्रयास कर रहे हैं कि यह मंदी महामंदी साबित न हो और जल्‍दी से जल्‍दी बेहतर आर्थिक उपायों से इस पर नियंत्रण पाया जा सके। मौजूदा मंदी का सीधा असर भारतीय अर्थव्‍यवस्‍था के बैरोमीटर शेयर बाजार पर भी पड़ा है जिसमें पिछले दस महीनों में निवेशकों के करोड़ों रुपए स्‍वाहा हो गए हैं। तकनीकी विश्‍लेषक हितेंद्र वासुदेव का कहना है कि बीएसई सेंसेक्‍स आईसीयू में है। वे कहते हैं कि 31 अक्‍टूबर 2008 को समाप्‍त होने वाले सप्‍ताह में साप्‍ताहिक रेसीसटेंस 9339-10111 और 10820 रहेगा। जबकि, साप्‍ताहिक निम्‍न स्‍तर 7928-6250-6150 रहेंगे।

बीएसई सेंसेक्‍स के इतिहास की बात करें तो इसने वर्ष 1992 में 4546 अंक और वर्ष 2000 में 6150 का ऊपरी स्‍तर बनाया था। वर्ष 1992 में बना 4546 का ऊपरी स्‍तर वर्ष 1993 में गिरकर 1980 अंक के स्‍तर पर आ गया था, जो तकरीबन 56।34 फीसदी की गिरावट दिखाता है। इसी तरह वर्ष 2000 में 6150 की ऊचाई से सेंसेक्‍स 2594 अंक आ पड़ा। यानी 57.43 फीसदी की कमी। सेंसेक्‍स को 4546 अंक से 1980 तक आने में 12 महीने लगे जबकि 6150 से 2594 आने में 19 महीनों का समय लगा। इसके बाद वर्ष 2003 तक यानी कुल 38 महीनों तक करेक्‍शन का ही दौर रहा। बीएसई सेंसेक्‍स ने अपनी पिछली ऊंचाई 21206 को छूआ और पिछले सप्‍ताह 8587 अंक यानी 59.51 फीसदी की धुलाई में नौ महीनों का समय लगा। यह धुलाई भाव और समय दोनों ही ढंग से ज्‍यादा तेज रही।

पिछली दिवाली पर 9 नवंबर 2007 को बीएसई सेंसेक्‍स 18907 अंक था जो इस दिवाली पर 8500 अंक के करीब आ गया है। दुनिया भर के शेयर बाजारों की अगली चाल इस बात पर काफी निर्भर करेगी कि अमरीका में अगला राष्‍ट्रपति कौन बनता है और वह अपने देश की अर्थव्‍यवस्‍था को सुधारने के लिए किस तरह के कदम उठाता है। इसके अलावा घरेलू मोर्चे पर भी यही स्थिति होगी। अब लोकसभा चुनाव का समय नजदीक आता जा रहा है। चुनाव से पहले राजनीतिक समीकरण बनेंगे, बिगड़ेंगे। अगले आम चुनाव के बाद यदि तीसरा मोर्चा सत्ता में आता है तो शेयर बाजार के लिए घातक होगा लेकिन भाजपा या कांग्रेस में से किसी एक दल की सरकार बनती है तो शेयर बाजार में तेजी का दौर शुरु हो जाएगा।
इस दिवाली से अगली दिवाली के बीच बॉम्‍बे स्‍टॉक एक्‍सचेंज (बीएसई) का सेंसेक्‍स 6100 से 12900 के बीच घूमता रहेगा। जबकि, नेशनल स्‍टॉक एक्‍सचेंज (एनएसई) का निफ्टी 1800 से 3800 के बीच रहेगा।

शेयर बाजार में बड़ी रिकवरी पर बिकवाली दबाव का जोर रहेगा जिससे लगातार तेजी की उम्‍मीद न करें। निवेशकों में पैदा हुए भय से समूचा माहौल मंदी का बन गया है। लेकिन निवेशकों को चाहिए कि वे खुद होमवर्क करें और देखें कि अब मंदी कहां तक बढ़ सकती है। बाजार में तेजी के समय और तेजी एवं मंदी के समय और मंदी का राग अलाप अलाप कर निवेशकों को गलत रास्‍ते पर दौडने वालों की कमी नहीं है। इसलिए अपना होमवर्क करना जरुरी हे क्‍यों‍कि शेयर बजार में आपका पैसा लगेगा ना कि तेजी-मंदी का ढोल पीटने वालों का। अपना निवेश अब हर गिरावट पर 20-20 फीसदी के टुकड़ों में करते रहे और बेहतर फंडामेंटल एवं प्रबंधन वाली कंपनियों के शेयरों को खरीदते रहे। यह निवेश का एक बेहतर मौका साबित होगा।

इस दिवाली से अगली दिवाली तक के लिए निवेशक पेट्रोनेट एलएनजी, एनटीपीसी, एलआईसी हाउसिंग, इंडसइंड बैंक, एक्सिस बैंक, बैंक ऑफ बड़ौदा, व्‍हर्लपूल इंडिया, आईओएन एक्‍सचेंज, सेल, फिलिप्‍स कार्बन ब्‍लैक, अपोलो हॉस्पिटल, ब्रिटानिया इंडस्‍ट्रीज, वोकहॉर्ट, वोलटैम्‍प ट्रांसफार्मर्स, जीवीके पावर, इक्रा, क्‍युमिंस इंडिया, स्‍वराज इंजिन, मद्रास सीमेंट, ज्‍योति स्‍ट्रक्‍चर और त्रिवेणी इंजीनियरिंग शेयरों की हलचल पर नजर रख सकते हैं।

October 28, 2008

सेंसेक्‍स का सुपर शो

रजनीकांत

जनवरी में जंप लगाया (Month High-21206- Low-15332)
फरवरी में फेड होना शुरू किया (Month High 18895- Low 16457)
मार्च में मारकाट मचाया (Month High- 17227- Low 14677)
अप्रैल में कुछ एडवांस हुआ (Month High- 17480- Low 15297)
मई में हुआ कुछ और मस्त (Month High -17735- Low 16196)
जून में शुरू हुआ जलजला (Month High -16632- Low 13405)
जुलाई में निवेशकों के और जले हाथ (Month High -15130- Low 12514)
अगस्त में जगाई आस (Month High - 15579- Low 14002)
सितंबर में फिर खूब ढाहा सितम (Month High -15107- Low 12153)
अक्टूबर में तेज किया अटैक (Month High -13203- Low 8566)
क्या नवंबर में करवाएगा नो-नो....
दिसंबर में भी क्या यह रहेगा दिशाहीन...
इस साल कैसा रहेगा सेंसेक्स का शो
सुपर हिट या सुपर फ्लाप ।

October 27, 2008

ये रहे अगले हैवीवेट्स

भारतीय शेयर बाजार जनवरी से लगातार गिरावट की ओर है और अब रोज मुक्‍त रुप से गिर रहा है। लेकिन इक्विटी विश्‍लेषकों को यह नहीं पता है कि इसका बॉटम लेवल कहां होगा। वाह मनी की राय में पहला निचला स्‍तर बीएसई सेंसेक्‍स का 7500 अंक है। बीएसई सेंसेक्‍स के इस स्‍तर पर आने पर जिन शेयरों की आप खरीद करना चाहते हैं उनमें 20-20 फीसदी शेयरों की खरीद चालू की जा सकती है लेकिन यह निवेश यह मानकर करें कि आपको अगले दो साल तक इस पैसे की जरुरत नहीं है।

हमारी राय में बीएसई सेंसेक्‍स इस दिवाली से अगली दिवाली तक 6100 से 12900 के बीच और एनएसई का निफ्टी 1800 से 3800 के बीच घूमता रहेगा। वाह मनी पेश कर रहा है कुछ खास शेयरों की सूची जिनमें आप हर घटे भाव पर निवेश कर सकते हैं जो आपके लिए बेहद फायदेमंद रहेंगे। इस सूची में हैवीवेट्स की कमी खल सकती है लेकिन ये शेयर मुनाफे के हिसाब से अगले हैवीवेट्स होंगे।

पेट्रोनेट एलएनजी
एनटीपीसी
एलआईसी हाउसिंग
इंडसइंड बैंक
एक्सिस बैंक
बैंक ऑफ बड़ौदा
व्‍हर्लपूल इंडिया
आईओएन एक्‍सचेंज
सेल
फिलिप्‍स कार्बन ब्‍लैक

October 24, 2008

महा रिटर्न जय मंत्र

सही तरीके और सही मात्रा में शेयर आधारित फंडों का चयन, निवेशक के लिए लंबे समय के निवेश लक्ष्यों के मामले में अति महत्त्वपूर्ण है। अब इस तरीके और मात्रा के साथ जुड़े 'सही' के पुछल्ले से निबटने के लिए पेशेवर सलाहकार की शरण में जाना आसान उपाय है, लेकिन अपनी गाढी कमाई की पूंजी को जोखिम भरे शेयर बाजार में निवेशित करने का इरादा करते समय कुछ महत्त्वपूर्ण बातें खुद भी ध्यान में रखी जानी चाहिए। इससे एक तो आत्मविश्वास बढता है और दूसरे सचेतता आती है जो कि रूपए-पैसे के मामले में सुरक्षा के लिहाज से बहुत ही जरूरी है।

1- सबसे पहले अपनी जोखिम क्षमता का आकलन करें। यह निवेश के अनुभवों, आपके दृष्टिकोण और भावनात्मक दृढता पर आधारित होता है। जोखिम उठाने की क्षमता और इच्छा दो अलग-अलग चीजें हैं, यह याद रखना बहुत जरूरी है। जोखिम क्षमता के आधार पर ही निवेश की अति सुरक्षित, या सामान्य सुरक्षित या आक्रामक रणनीति बनानी चाहिए। अति सुरक्षित नीति जहां पूंजी की सुरक्षा को सर्वोच्च सुनिश्चित करती है, वहीं रिटर्न के मामले में कमजोर भी साबित होती है जबकि आक्रामक रणनीति बेहद अच्छे रिटर्न भी दिला सकती है और आपकी कुल पूंजी को डुबो भी सकती है। इस लिहाज से मध्य का मार्ग ज्यादा लोगों को रास आता है, यानी संतुलित जोखिम के साथ संतुलित रिटर्न।
पढ़ें: डर पर हावी लालच
2- बाजार में तेजी के समय कम कीमत वाले शेयरों की कीमत से आकर्षित होकर खरीदारी करना, तब खतरनाक साबित होता है जब मूल्यांकन सटीक न किया गया हो। 'वैल्यू इन्वेस्टिंग' का मंत्र अनेकों बार वारेन बफेट का नाम ले-लेकर दोहराया जाता है, लेकिन खरीदारी के वक्त इसे भुला देने वाले लोगों की तादाद भी बहुत ज्यादा है, जो बाद में किंकर्तव्यविमूढता की स्थिति में पहुंचते देखे गए हैं। कीमत का आय से अनुपात भी बहुप्रचलित तरीका है। माना एक शेयर 1000 और दूसरा 10 रूपए का बिक रहा है, लेकिन पहली कंपनी की प्रति शेयर आय 200 रूपए है तो इसका पी/ई हुआ 5, और अगर दूसरी कंपनी की प्रति शेयर आय 1 रूपया है, तो इसका पी/ई हुआ 10, इसका मतलब यह कि दूसरा वाला शेयर पहले की तुलना में दूना महंगा है।

3- मुक्त नकदी प्रवाह जानना जरूरी है। यह जानना जरूरी है कि कंपनी द्वारा दिखाया जा रहा लाभ कंपनी के पास नकदी के रूप में है और कहीं ऋण खातों में ही समायोजित तो नहीं हो रहा है।
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4- हालांकि कंपनी की अतीत की गतिविधियाँ, भविष्य पर असर डालती हैं, लेकिन शेयर का भावी मूल्य कंपनी की भावी योजनाओं, रणनीतियों और बाजार परिस्थितियों पर ज्यादा निर्भर होगा, न कि इस पर, कि पहले कंपनी क्या करती रही। इसलिए, भावी संभावनाओं को पहचानने की कोशिश ज्यादा से ज्यादा की जानी चाहिए।

5- कुछ भी थोक में न खरीदें। बाजार का भविष्य कोई नहीं जानता और अच्छा और बुरा समय कभी भी सर्वदा के लिए समाप्त नहीं होता। इसलिए, अनुशासित निवेश की बात की जाती है, ताकि जोखिम का समय-काल से तालमेल बिठाया जा सके।

6- यद्यपि विविधीकरण आवश्यक है, लेकिन ढेरों योजनाओं में एक साथ निवेश करके अति विविधीकरण के अपने दुष्परिणाम भी देखे गए हैं। ब्लू-चिप बड़ी कंपनियों, मझोली संभावनाशील कंपनियों और छोटी, लेकिन बेहतर प्रदर्शन करने वाली कंपनियों के बीच एक संतुलन के साथ अपने छोटी, मध्यम और लंबी अवधि के निवेश लक्ष्यों के बीच जिसने अपने पोर्टफोलियो को सही तरह से व्यवस्थित कर लिया, वही असली खिलाड़ी साबित होता है।

7- हर सम्भव प्रयास करके शेयरों में वही पूंजी लगाई जानी चाहिए, जिसकी आवश्यकता एक लंबे समय तक, कम से कम चार-पांच साल तक न पड़ने वाली हो। लंबी अवधि, बाजार की अनिश्चित अस्थिरता से निबटकर आपके लिए बेहतरीन रिटर्न की फसल तैयार करती है।

8- बेचने का कोई सर्वमान्य मुहूर्त नहीं होता। कभी भी, जब आपको जरूरत हो, बेचिए, लेकिन यह ध्यान में रखिए कि समय का जो लक्ष्य आपने निवेश करते समय तय किया था, वह अगर पूरा किया जा सका है, तो निर्णय अधिक सटीक होगा।

इन छोटी-मोटी, सीधी-सादी बातों को ध्यान में रखना न तो पिछड़ापन है, न ही फिजूल की दिमागी कसरत। याद रखिए, भविष्य की ठीक-ठीक पैमाइश कर सकने वाला कोई टूल न बना है, न बनेगा। अनुशासित रहकर सामान्य नियमों का पालन करने से ही आप अपने पोर्टफोलियो को एक कमाऊ और वफादार साथी में तब्दील कर सकते हैं और वर्तमान जैसे बाजार के कितने ही हिचकोलों से निबटकर मुसकरा सकते हैं।

October 21, 2008

अन्तरात्मा खडी़ बजार में...

मोहन वर्मा

horse car पश्चिम बंगाल की जनता के नाम अपने खुले पत्र में टाटा ने बहुत बुनियादी सवाल उठाया है, कि कानून का शासन, आधुनिक ढांचा और औद्योगिक विकास दर वाले खुशहाल राज्य बनाम टकराव, आंदोलन, हिंसा और अराजकता के विध्वंसकारी राजनीतिक माहौल से बरबाद होते राज्य में से पश्चिम बंगाल की जनता किस प्रकार के राज्य को चुनना चाहेगी?

इस मूलभूत सवाल के परिप्रेक्ष्य में यह जानना दिलचस्प है, कि एक ही शब्द के मायने, एक ही बात की परिभाषाएं, किस तरह व्यक्तियों और समुदायों के लिए अलग-अलग विरोधाभासी रूख अख्तियार करती हैं। कानून का शासन यह है कि राज्य प्राकृतिक संसाधनों को उन ब़डे देशी-विदेशी उद्योगपतियों के हवाले कर दे, जिनकी औद्योगिक परियोजनाओं की सफलताएं, भारत के भावी विकसित स्वरूप का निर्माण करने वाली हैं। कानून का शासन वे लोग मानें, जिनकी जिंदगियों में शेयरों का, कंपनियों का कोई सीधा दखल नहीं, बल्कि जिनकी जिंदगी की शर्तें जल-जंगल और जमीन से जुडी़ हैं। पश्चिम बंगाल सरकार कानून के शासन के परीक्षण के इस मामले में विफल रही और अंतत: टाटा के आगे बिछ-बिछ जाने को तैयार विभिन्न मुख्यमंत्रियों में से टाटा ने एक मजबूत हिंदू को चुन लिया।

आधुनिक ढांचे की बात करते ही कल्पना में मल्टीप्लेक्सों-मॉलों-हाइवे-फ्लाईओवरों-ऊंची चमकीली बिल्डिंगों और सजे-धजे खर्चीले लोगों से पटे पडे़ शहरों की दौडती-भागती तस्‍वीर आपके दिलोदिमाग में उभरती है कि नहीं? जहां बच्चों के लिए ब्रांडेड नैपी से लेकर जवानों के लिए विश्व स्तर के सारे साजो-सामान, सुख-सुविधाएं और बुजुर्गों के लिए ओल्ड-होम्स मौजूद हों। अब रही औद्योगिक विकास दर, तो इस दर के साथ भारत को विश्व की आर्थिक महाशक्ति की पांत में ला खडा़ करने को आतुर लोगों के लिए पर्यावरणवादी और जल-जंगल-जमीन से जुडे लोगों के सुर में सुर मिलाने वाले अराजकतावादी और विध्वंसकारी लोग, बुरे सपने की तरह हैं, जो उडीसा से बंगाल तक और छत्तीसगढ़ से झारखंड तक पोस्को-टाटा-वेदान्ता-सलेमग्रुप आदि-आदि-इत्यादि कंपनियों के खिलाफ इंटरनेट, पम्फलेट, जुलूस, धरना-प्रदर्शन, लोगों को उकसाने, जनहित याचिकाओं आदि-आदि-इत्यादि तरीकों से मुश्किलों पर मुश्किलें खडी करते जा रहे हैं।

पूंजी के सर्वसमावेशी चरित्र पर अंगुली उठाने में अपने खिलाफ विकास विरोधी, वामवादी, साम्यवादी, राजनीतिप्रेरित आदि-आदि किस्म के फतवे जारी हो जाने के चांस ज्यादा हैं, लेकिन कौन साबित कर सकता है कि खुशहाली के मानक सबके लिए एक जैसे हो सकते हैं ? हिंदुस्‍तान को आजादी मिलने के बाद आधी सदी तक कितने ऐसे लोग थे, जो देश की प्रगति को सेंसेक्‍स के साथ जोड़कर देखते थे? सेंसेक्‍स ने जिन लोगों को धनकुबेर बनाया उन्होंने चमचमाती कारों, लग्जरी विमान यात्राओं, शानदार एयरकंडीशन्ड बिल्डिंगों की दुनिया में खोकर राहत की सांस ली, कि चलो देर से ही सही, भारत विकसित होना शुरू तो हुआ।

अराजकता, विध्वंस, टकराव और हिंसा की बात करने से पहले एक पहेली बूझिए कि विश्वव्यापी आर्थिक मंदी, बडी वित्तीय संस्थाओं के धराशायी होने, बेलआउट के घंटी हिलाऊ सरकारी प्रयासों के बावजूद दुनिया भर के शेयर बाजारों के ताश के महलों की तरह ढहने, निवेशकों के माथा पीटने का यह दौर न आया होता, और दुनिया की प्रगति के साथ अपना दुलारा सेंसेक्‍स भी पचीस-तीस हजारी पालने में झूल रहा होता, तो क्या भारत से गरीबी-शोषण-अत्याचार-बालश्रम-स्त्री शोषण-कन्या भ्रूण हत्या-जातीय हिंसा-कुपोषण-बेरोजगारी-वेश्यावृत्ति-आतंकवाद-अंधविश्वास आदि-आदि समाप्त हो गए होते ? सैकडों करोड़ रूपए में चुनाव-प्रचार के ठेके नामी विज्ञापन कंपनियों को देने वाली राजनीतिक पार्टियाँ जब सत्ता में आती हैं तो पूंजीवादी ताकतों के बे-धौंस चरने-खाने को देश परोस देना उनकी एक मजबूरी, और किसान-मजदूर के हित की माला जपना और लोक-लुभावन योजनाएं बनाना, तथाकथित जनकल्याणकारी फैसलों की जुगाली करना दूसरी मजबूरी होती है।

आप निवेशक हैं, तो इन कंपनियों का मुनाफा दिन-दूना रात-चौगुना बढ़ने की कामना करेंगे, ताकि आपको भी फायदा हो सके, जिसे अन्तत: कंपनियों द्वारा आक्रामक तरीके से समाज में विकसित की गई उपभोगवादी मानसिकता के चलते कंपनियों की जेब में ही फिर जाना है। कोढ और खाज से ग्रस्त वेश्या अपना चेहरा मेकअप से पोत-पात कर ग्राहक रिझाने को बाजार में बैठी हो, लेकिन खुजली लगी हो, तो खुजाना पडे़गा ही। और तब मवाद हाथ के जरिए चेहरे पर भी लगकर असलियत बयान करेगा। यह खुजली-नासूर की अराजकता है, जो 'स्थिति शांतिपूर्ण लेकिन नियंत्रण में' टाइप प्रयासों से दबाए नहीं दबेगी, प्रगति सुनिश्चित करने के दावों भरे बयान चाहे जितने भी आते रहें। समाज में आर्थिक स्तर पर बने कई वर्गों के बीच विकास को जिस तरह उपधाराओं में बंट जाने दिया गया है, उसके चलते जिसके हिस्से में गंदा नाला आया है, उसके आक्रोश का सामना मिनरल वॉटर वाले, गंगाजल वाले को करना ही पडेगा। एक मुख्यधारा बनाकर सभी को इसमें शामिल करने की बात दूर की कौडी है, जिसके बारे में सोचने तक की फुरसत किसी को नहीं। तो, फिलहाल मंदी का स्यापा करते लैपटॉप धारियों को एक खिडकी से और दूसरी खिडकी से तोडफोड-अराजकता-हिंसा-आगजनी-हत्या-फसाद मचाती भीड को देख-देख कर ठंडी आहें भरते रहिए।

October 20, 2008

धैर्यवान का साथ देगा शेयर बाजार

भारत ही नहीं दुनिया भर के शेयर बाजार इस समय वैश्विक वित्तीय संकट की चपेट में हैं जिससे आम और खास दोनों तरह के निवेशक बुरी तरह मायूस हैं। शेयर बाजारों का और बुरा हाल होने की आंशका अभी भी बनी हुई है लेकिन इतिहास इस बात का भी गवाह है कि बुरे दौर से गुजरने के बाद इस बाजार ने हमेशा बेहतर रिटर्न दिया है तभी तो दुनिया के सबसे बड़े निवेशक वारेन बफेट इस समय बेहतर अमरीकी कंपनियों में निवेश कर रहे हैं। असल में शेयर बाजार और लक्ष्‍मी ने हमेशा धैर्यवानों का साथ दिया है।

न्यूयॉर्क टाइम्स में लिखे अपने लेख में वारेन बफेट ने कहा है कि अमरीका को खरीदो, मैं इसे खरीद रहा हूं। वित्तीय संकट के केंद्र में बैठे इस शक्तिशाली और धैर्यवान निवेशक का एक-एक शब्द निवेशकों के लिए पत्थर की लकीर जैसे होता है और इसका सकारात्मक असर दुनिया भर के बाजारों में पड़ सकता है। वे लिखते हैं कि 20 वीं सदी में अमरीका ने दो विश्वयुद्धों के साथ लंबे समय तक चला शीतयुद्ध और अनेक मंदियां देखी। हर बार लगा कि रिकवर कर पाना कठिन है बावजूद डॉव जोंस 11497 पर पहुंच गया।

अमरीका, ताईवान सहित अनेक देशों ने अपने यहां शेयरों में शार्ट सेल पर रोक लगा दी है ताकि मंदडि़ए ज्‍यादा हावी न हो सके लेकिन भारत में सेबी ने इस पर कोई निर्णय नहीं किया है। सेबी के पूर्व अध्‍यक्ष डी आर मेहता के कार्यकाल में शार्ट सेल पर रोक लगाई गई थी जिसे पिछले दिनों हटा लिया गया। अब एक बार फिर घरेलू शेयर बाजार में अब यह मांग जोरों पर उठ रही है कि जिस शार्ट सेल और फ्यूचर एंड ऑप्‍शन (एफएंडओ) ने अमरीकी शेयर बाजार का पतन किया उस पर भारत में रोक लगनी चाहिए। सेबी ने अभी तक इस पर कुछ खुलकर नहीं कहा है लेकिन उसने शार्ट सेल संबंधी आंकड़े और उसके प्रभाव को जानने की कसरत शुरु कर दी है।

आईएमएफ के फर्स्ट डिप्टी मैनेजिंग डायरेक्टर जॉन लिप्स्की का कहना है कि वित्तीय क्षेत्र में घट रही घटनाओं से आने वाले कुछ महीनों तक अनिश्चितता का माहौल बना रहेगा। वित्त क्षेत्र में बड़े संकट की आशंका से इनकार नहीं किया जा सकता। रिलायंस कैपिटल के अध्यक्ष अनिल अंबानी ने पिछले दिनों कंपनी की सालाना आम बैठक में शेयरधारकों से कहा था कि अंतरराष्‍ट्रीय अर्थव्यवस्था के साथ एकीकरण के मद्देनजर मौजूदा वित्तीय संकट से भारत भी प्रभावित हुए बगैर नहीं रह सकता।

आईसीआईसीआई प्रूडेंशियल एसेट मैनेजमेंट के उप प्रबंध निदेशक और मुख्य निवेश अधिकारी नीलेश शाह मानते हैं कि इससे कोई फर्क नहीं पड़ता कि भारतीय बाजार कितने मजबूत हैं या हम क्या करते हैं। सबसे बड़ा असर बात से पड़ेगा कि अंतरराष्‍ट्रीय बाजार कैसा रहता है।इस समय अधिकतर इक्विटी विश्‍लेषक चुप हैं और उन्‍हें यह पता ही नहीं है कि बाजार कहां जाकर ठहरेगा। बस गिरने के साथ और गिरने की बात और बढ़ने के साथ उछाल की बात। किसी को भी अंदाजा नहीं था कि शेयर बाजार पूरी तरह पहाड़ के नीचे आ जाएंगे। वाह मनी की राय में बीएसई सेंसेक्‍स नीचे में 7500 अंक तक जा सकता है लेकिन निवेशकों को बेहतर शेयरों की खरीद नौ हजार के आसपास से करनी चाहिए और यह खरीद 20 फीसदी हिस्‍से की होनी चाहिए। यानी नौ हजार अंक के बाद हर बड़ी नरमी पर इतने फीसदी ही खरीद। उदाहरण यदि आप टिस्‍को के सौ शेयर खरीदना चाहते हैं तो हर गिरावट पर 20-20 शेयर ही खरीदें। एक साथ सौ शेयर नहीं खरीदें। लेकिन एक बात यहां ध्‍यान रखें कि यह खरीद दो से तीन साल के लिए करें क्‍योंकि सेंसेक्‍स को नई ऊंचाई पर पहुंचने में इतना वक्‍त लगेगा ही।

बॉम्‍बे स्‍टॉक एक्‍सचेंज यानी बीएसई सेंसेक्‍स 20 अक्‍टूबर से शुरु हो रहे नए सप्‍ताह में 10388 अंक से 9527 अंक के बीच घूमता रहेगा। जबकि नेशनल स्‍टॉक एक्‍सचेंज यानी एनएसई का निफ्टी 3185 अंक से 2921 के बीच कारोबार करेगा। तकनीकी विश्‍लेषक हितेंद्र वासुदेव का कहना है कि बीएसई सेंसेक्‍स को 8799 अंक पर सपोर्ट मिलना चाहिए क्‍योंकि यही वह स्‍तर है जहां भारतीय शेयर बाजारों ने तेजी की दौड़ शुरु की थी और सेंसेक्‍स रिकॉर्ड ऊंचाई पर पहुंचा था। सेंसेक्‍स का निचली रेंज 9720-8800 अंक दिखती है लेकिन यह अंतिम नहीं है क्‍योंकि बाजार सर्वोच्‍च है और उससे ऊपर कोई नहीं हो सकता। इस सप्‍ताह बीएसई सेंसेक्‍स को 9300-8799 पर सपोर्ट मिल सकता है। साप्‍ताहिक रेसीसटेंस 10585-11259-11870 पर देखने को मिलेगा। यदि सेंसेक्‍स इस सप्‍ताह 11870 अंक से ऊपर बंद होता है तो यह तगड़ा निचला स्‍तर बनाने से बच सकता है। भारतीय रिजर्व बैंक की 24 अक्‍टूबर को मौद्रिक नीति की समीक्षा के अलावा 23 अक्‍टूबर को रिलायंस इंडस्‍ट्रीज के नतीजे सामने आएंगे, जिनका बाजार पर सीधा असर पड़ेगा।

इस सप्‍ताह निवेशक नीतिन फायर प्रोटेक्‍शन, बैंक ऑफ बड़ौदा, कार्बोरेंडम यूनिवर्सल, कर्नेक्‍स माइक्रोसिस्‍टम, एचडीएफसी बैंक, सुजलान एनर्जी, रेडिगंटन इंडिया, गेल, मैरिको, ओनमोबाइल ग्‍लोबल पर ध्‍यान दे सकते हैं। इसके अलावा हैवीवेट्स में हर उतार चढ़ाव का सावधानी के साथ फायदा उठा सकते हैं।

October 17, 2008

सेंसेक्‍स का और टूटना बाकी

दुनिया की सबसे बड़ी 14 खबर डॉलर की अर्थव्‍यवस्‍था ने घुटने टेक दिए हैं...यह बात है अमरीकी अर्थव्‍यवस्‍था की जो समूची दुनिया में अपने डॉलर का डंका बजवा रही थी लेकिन इसे अब एक बार फिर 1929-30 की महामंदी जैसे हालात का सामना करना पड़ रहा है। 700 अरब डॉलर की अमरीकी वित्तीय बचाव योजना भी मंदी के इस तूफान में ऊंट के मुंह में जीरा साबित होती नजर आ रही है। दुनिया भर के आर्थिक ज्ञानी तो यह मानते हैं कि 1930 के ग्रेस डिप्रेशन के बाद यह सबसे बड़ा वित्तीय झटका है। लिक्विडिटी इन्‍फयूजन से लेकर अधिग्रहण तक, जो कुछ भी संभव है किया जा रहा है। इससे वित्तीय बाजारों में कुछ स्थिरता की उम्‍मीद की जा सकती है लेकिन पहले जैसी गर्मी लौट पाएगी, यह कठिन लग रहा है।

आईएमएफ के फर्स्ट डिप्टी मैनेजिंग डायरेक्टर जॉन लिप्स्की का कहना है कि वित्तीय क्षेत्र में घट रही घटनाओं से आने वाले कुछ महीनों तक अनिश्चितता का माहौल बना रहेगा। वित्त क्षेत्र में बड़े संकट की आशंका से इनकार नहीं किया जा सकता। रिलायंस कैपिटल के अध्यक्ष अनिल अंबानी ने पिछले दिनों कंपनी की सालाना आम बैठक में शेयरधारकों से कहा था कि अंतरराष्‍ट्रीय अर्थव्यवस्था के साथ एकीकरण के मद्देनजर मौजूदा वित्तीय संकट से भारत भी प्रभावित हुए बगैर नहीं रह सकता। आईसीआईसीआई प्रूडेंशियल एसेट मैनेजमेंट के उप प्रबंध निदेशक और मुख्य निवेश अधिकारी नीलेश शाह मानते हैं कि इससे कोई फर्क नहीं पड़ता कि भारतीय बाजार कितने मजबूत हैं या हम क्या करते हैं। सबसे बड़ा असर बात से पड़ेगा कि अंतरराष्‍ट्रीय बाजार कैसा रहता है।

इस समय अधिकतर इक्विटी विश्‍लेषक चुप हैं और उन्‍हें यह पता ही नहीं है कि बाजार कहां जाकर ठहरेगा। बस गिरने के साथ और गिरने की बात और बढ़ने के साथ उछाल की बात। किसी को भी अंदाजा नहीं था कि शेयर बाजार पूरी तरह पहाड़ के नीचे आ जाएंगे। वाह मनी की राय में बीएसई सेंसेक्‍स नीचे में 7500 अंक तक जा सकता है लेकिन निवेशकों को बेहतर शेयरों की खरीद नौ हजार के आसपास से करनी चाहिए और यह खरीद 20 फीसदी हिस्‍से की होनी चाहिए। यानी नौ हजार अंक के बाद हर बड़ी नरमी पर इतने फीसदी ही खरीद। उदाहरण यदि आप टिस्‍को के सौ शेयर खरीदना चाहते हैं तो हर गिरावट पर 20-20 शेयर ही खरीदें। एक साथ सौ शेयर नहीं खरीदें। लेकिन एक बात यहां ध्‍यान रखें कि यह खरीद दो से तीन साल के लिए करें क्‍योंकि सेंसेक्‍स को नई ऊंचाई पर पहुंचने में इतना वक्‍त लगेगा ही। लक्ष्‍मी ने हमेशा धैर्यवानों का साथ दिया है इसलिए धैर्य रखें और इंतजार करें अंधेरे के बाद फिर उजाले का।

वाह मनी ब्‍लॉग काफी समय से अपडेट नहीं हो पा रहा था जिसका खेद है। इसकी वजह मां की तबियत ठीक नहीं होना था। वे इस संसार से 28 सितंबर 2008 को विदा हो गईं। उनके जाने के बाद आज यह पहली पोस्‍ट है।