adsense

December 26, 2010

हिंदुस्‍तानी जनता अब रोएगी महंगी चीनी का रोना

समूची दुनिया में पड़ रही इस जोरदार सर्दी के मौसम में सभी के दांत किटकिटा रहे हैं, शरीर कांप रहा है। बर्फ और सर्दी...बचाओ भगवान। सर्दी से बचने के लिए गर्मा गर्म चाय पीकर कुछ जोश आ जाता है आम आदमी के शरीर में। लेकिन अब यह सुख भी जल्‍दी दूर होना वाला है। उल्‍टा गाना गाना पड़ेगा...सुख भरे दिन बीते रे भैया, अब दुख आया रे...रोना धोना नया लाया रे। प्‍याज, लहसुन, टमाटर, आलू, सब्जियां, फल, दूध इन सबके बाद पिछले थोड़े समय से चैन से खा रहे कुछ सस्‍ती चीनी अब कड़वी होने जा रही है।

27 दिसंबर 2010 को जब हिंदुस्‍तान की जनता आंख खोलेगी चाय पीने के लिए तब उसे पता चलेगा कि आज से तो चीनी में सारे सट्टेबाज दुगुने जोश से जुट गए हैं। कमोडिटी एक्‍सचेंज खुलेंगे दस बजे और चालू हो जाएगा चीनी में सट्टा। एक के दो, दो के चार। मारो इस साली जनता को जो बहुत दिनों से सस्‍ती चीनी खा रही थी। इसे इस बार चीनी 42 के बजाय 48 में नहीं खिलवाई तो हमारा नाम सट्टेबाज नहीं। देश का जीडीपी का बढ़ रहा है और इसे चाहिए सस्‍ते में चीनी। मुंह मीठा करना है कि देश खूब प्रोगरेस कर रहा है लेकिन सस्‍ते की आदत नहीं जाती। इस फोकट चंद जनता को कौन कहता है चीनी खाओ, हम तो महंगी चीनी कर डायबीटिज जैसी बीमारियों से बचाना चाहते हैं। चीनी वायदा से फायदा उसे नहीं होगा जो महीने में दो से चार किलो चीनी खाता है। बल्कि इससे तिजोरियां भरेंगी चीनी मिलों और कारोबारियों की जो चुनाव लड़ने के लिए राजनीतिक पार्टियों को देते हैं पैसे। इस समय तो लोकतंत्र का तथाकथित चौथा खंभा मीडिया भी सो रहा है, पहले चीनी 38 रुपए हो जाने दो, फिर हल्‍ला मचाएंगे ताकि तब तक न्‍यूज तैयार हो जाएगी। बाइट के लिए लोग मिल जाएंगे। तथाकथित चौथा खंभा इसलिए कि देश के संविधान में कहीं भी यह नहीं लिखा है कि मीडिया चौथा खंभा है।

चीनी के सट्टेबाज खूब जोश मे हैं। दिल्‍ली से परमीशन लेकर आए हैं 19 महीने बाद। करो चीनी में सट्टा। देश की जनता तो ऐसे ही रोते रहती है। सस्‍ती थी तो रो रही थी, कितनी चीनी खाएं, महंगी है तो रोएगी कि खाने को नहीं मिलती। हर थोड़े थोड़े दिन में किसी न किसी चीज को महंगी करते रहो। मौजूदा कृषि मंत्री के रहते देश की जनता कैसे सुख से जी ले यह देखो। पूरी तरह चाक चौबंद रहो। जनता को मार मार कर निचोड़ दो। महंगाई का ठीकरा तो मीडिया के माथे फोड़ देंगे कि चीनी पर हल्‍ला मचा मचाकर मीडिया ने इसे महंगा किया। अभी दिल्‍ली की मुख्‍यमंत्री शीला दीक्षित ही चिल्‍ला रही थी मीडिया वालों पर कि दाम कहां बढ़े हैं, महंगाई आप लोगों ने बढ़ाई है। लेकिन पांच लाख टन चीनी निर्यात करने की परमीशन तो मीडिया ने नहीं दी। सारा निर्यात छह लाख 23 हजार टन का होगा।

जबकि इस देश की जनसंख्‍या और मांग इतनी ज्‍यादा है कि सारी चीनी चट कर जाए। नेताजी, वाकई भूखक्‍ड जनता है, ऐसी जनता तो सोमालिया में भी नहीं है। देखिए ना, देश में इस साल 245 लाख टन चीनी बनने की उम्‍मीद है। जबकि सालाना खपत 230 लाख टन है। अब चाहे मौसम बिगड़ जाए या कुछ और वजह से चीनी का उत्‍पादन कम भी हो जाए तो चिंता किस बात की। बफर स्‍टॉक का क्‍या करेंगे। अगले साल की चिंता इस साल क्‍यों करें। हिंदुस्‍तानी चीनी विदेश चली गई तो वहां वाली यहां मंगवा लेंगे। पैसे तो जनता को भरने हैं। खाना है तो खाओ देशी हो या विदेशी। हम महात्‍मा गांधी की बात पर नहीं चलते स्‍वदेशी, क्‍योंकि हमारी पार्टी तो राष्‍ट्रवादी कांग्रेस पार्टी है, कांग्रेस थोड़े ही है। राष्‍ट्रवादी यानी इस राष्‍ट्र की कीमत पर अपनी मौज।

चीनी में वायदा कारोबार, निर्यात के अलावा राशन की चीनी यानी लेवी चीनी का दाम पहले ही बढ़ा दिए हैं। अब बोलो, शर्म नामक चीज ही नहीं है इस देश में। राशन नकली, असली बनवाकर सस्‍ते में चीनी चट कर रही थी जनता। बाबा लोग टीवी पर रोज बकते हैं मोह, माया में मत पड़ो लेकिन पैसे बचा रहे हैं सस्‍ती चीनी पाकर। अब पता चलेगा कि मोह और माया क्‍या होती है। चीनी के मायाजाल में चक्‍कर घीनी नहीं खिला दी इस जनता को मैं बारामती का सपूत नहीं। मर्द मराठा हूं। चीनी पर लागू स्‍टॉक सीमा पहले ही चुपचाप हटा दी। करो जमा चीनी, जमाखोरी न करोगे तो पैसा कैसे कमाओगे मेरे व्‍यापारियों। और मेरी जनता तुम्‍हें तो डायबीटिज जैसी बीमारी से बचा रहा हूं उस उपकार को मानकर शुक्रिया मनाओ। अनाज, सब्जियां, फल, तेल, घी, दूध सब महंगा, लेकिन पता नहीं ऐसी नकटी जनता नहीं देखी जो अब भी जिएं जा रही है। और कोई देश होता तो गरीब जनता मर चुकी होती। फिर कहते ना रहे गरीब और अब ना रहेगी गरीबी। मेरा देश सबसे अमीर। हमारी जीडीपी 15 फीसदी....।

December 23, 2010

मीडिया वाले खा गए देश का सारा प्‍याज, टमाटर, आलू

दिल्‍ली की मुख्‍यमंत्री शीला दीक्षित को विधानसभा चुनाव के समय को छोड़कर हमेशा मीडिया पर गुस्‍सा आता है। राष्‍ट्रमंडल खेलों में हुए निर्माण कार्य और घोटालों के लिए जहां वे मीडिया पर बरस रही थीं वहीं अब प्‍याज, टमाटर और आलू सहित सब्जियों के दाम के लिए मीडिया को दोषी ठहरा रही हैं।

शीला दीक्षित ने क्‍या कहा.... सब्जियों की आसमान छूती कीमतों पर पूछे गए एक सवाल पर शीला पत्रकारों पर भड़क उठीं और उन्होंने बेतुका बयान देते हुए कहा कि "आपलोग दाम बढ़ा रहे हैं।" शीला दीक्षित से संवाददाताओं ने पूछा था कि "दिल्ली में प्याज के दाम आसमान पर हैं और राज्य सरकार बिजली के दाम बढ़ाने पर विचार कर रही है।" इस पर मुख्यमंत्री भड़क उठीं और उन्होंने दो टूक शब्दों में कहा कि "कहां बढ़ रहे हैं दाम, आपलोग बढ़ा रहे हैं।"

शीला जी सही है आपकी बात, क्‍योंकि मीडिया कर्मी आजकल न्‍यूज कवरेज करने में लगे हैं और उनके खेत खाली पड़े हैं। देखिए न तो वे समय पर सब्जियां उगा रहे हैं और न ही उनकी सही ढंग से सप्‍लाई कर रहे हैं। मैंने खुद कई बार कहा मीडिया दोस्‍तों से कि ये न्‍यूज व्‍यूज क्‍या है। छोड़ो और सब्जियां उगाओ, उनकी समय पर सप्‍लाई करो, ओबी वैन की जगह सब्जियों के ठेले ले लो और गली गली आवाज देते निकल जाओ। सब्जियां भी बिक जाएंगी और गली-गली की न्‍यूज भी मिल जाएंगी। दिन भर सब्‍जी बेचो, शाम को न्‍यूज चेपो। लेकिन मानते ही नहीं शीला जी। दिल्‍ली में आपके आलाकमान बैठे हैं, अब आप ही मीडिया के लिए यह आदेश निकलवाओ। मैं तो कहते-कहते थक गया।


शीला जी, पहले आप यह आंकडे जुटा लो कि अपने देश की जनसंख्‍या कितनी है। सब्जियों और दालों की पैदावार कितनी होती है। कितनी जरुरत है। और हम सब्जियां निर्यात क्‍यों करते हैं। देश के लोग तरसते रहे सब्जियों के लिए लेकिन निर्यात कर डॉलर, यूरो भरते रहे रिजर्व बैंक में। विदेशी धन चाहिए, चाहे देश की जनता तरसे स‍ब्‍जी, प्‍याज, टमाटर के लिए। खाने-पीने की चीज दूसरे देशों को भेजकर किसका भला किया जा रहा है। क्‍या देश को चीनी की जरुरत नहीं है। क्‍या मीडिया ने कहा कि पांच लाख टन चीनी निर्यात करो। जब चीनी के दाम बढ़ जाएंगे तब इस बढ़ोतरी का दोष मीडिया के सिर पर मढ देना।

लाल बहादुर शास्‍त्री के बाद तो किसी भी राजनेता ने नैतिक जिम्‍मेदारी लेना ही छोड़ दिया। नकटे होकर कुर्सी पर बैठे रहेंगे लेकिन पद नहीं छोड़ेंगे। बहुत पैसे खर्च कर पांच साल सेवा करने का ठेका मिला है, ऐसे ही थोड़े छोड़ देंगे, जब तक जनता ही नीचे न उतार दे क्‍यों छोड़ दें। पांच साल खूब चूस लो आम आदमी को, फिर चुनाव के समय उसे पुचकार कर वोट हासिल कर लेना राजनेताओं को खूब आता है। लेकिन अब यह समय भी जा रहा है। बिहार में क्‍या हुआ, लालू को आलू की तरह भूनकर जनता ने ठीकाने लगा दिया। रामविलास के सारे विलास ही समाप्‍त कर दिए। जागो, और दोष मीडिया को देने से बेहतर है, कुछ अच्‍छा करो, अन्‍यथा जनता जाग गई तो...न जनपथ आपके साथ होगा और न ही मुख्‍यमंत्री आवास।

December 22, 2010

टाटा के लिए दौलताबाद साबित हुआ साणंद

महाराष्‍ट्र के औरंगाबाद के समीप बसा दौलताबाद शहर हमेशा शक्‍तिशाली बादशाहों के लिए आकर्षण का केंद्र रहा। दौलताबाद की सामरिक स्थिति बहुत ही महत्‍वपूर्ण थी। यह उत्तर और दक्षिण भारत के मध्‍य में पड़ता है। यहां से पूरे भारत पर शासन किया जा सकता था। इसी वजह से बादशाह मुहम्‍मद बिन तुगलक ने इसे अपनी राजधानी बनाया था। उसने दिल्‍ली की सारी जनता को दौलताबाद चलने का आदेश दिया था। लेकिन दौलताबाद की खराब स्थिति एवं आम लोगों की तकलीफों के कारण उसे कुछ वर्षों बाद राजधानी पुन: दिल्‍ली ले जानी पड़ी। शायद ऐसा ही है देश के शक्तिशाली उद्योगपति रतन टाटा के साथ।

पश्चिम बंगाल के सिंगुर में लगने वाली यह परियोजना तृणमूल कांग्रेस की नेता ममता बनर्जी के तगड़े विरोध की वजह से लग नहीं पाई और टाटा इस परियोजना को लगाने के लिए अनेक राज्यों को खंगालते रहे लेकिन उनके पारिवारिक राज्य गुजरात के मुख्‍यमंत्री नरेंद्र मोदी के एक एसएमएस पर उन्‍होंने इस परियोजना को अहमदाबाद के करीब साणंद में लगाने का निश्‍चय कर लिया। इस लखटकिया कार परियोजना के गुजरात जाने से उस समय कई राज्यों के मुख्‍यमंत्री मन मसोस कर रह गए कि नरेंद्र मोदी ने बड़ी बाजी जीत ली। टाटा भी खूब धूमधाम से साणंद को लेकर आनंद मनाते रहे। साणंद में जमीन के जो भाव आठ सौ रुपए यार्ड नहीं थे वे देखते देखते साढ़े तीन हजार से चार हजार रुपए यार्ड पहुंच गए।

खूब धंधा जमा, लोगों को लगा उनकी तो तकदीर बदल गई और वाकई वहां के रहवासियों को फायदा ही हुआ लेकिन रतन टाटा के लिए यह आनंद अधिक दिन नहीं रहा। अहमदाबाद से लेकर साणंद के रास्‍ते की जमीन पर अनेक होटलें जिनमें ताज होटल भी शामिल है, अनेक मेगासिटी, स्‍कूलें एवं कई व्‍यावसायिक परिसर आने की घोषणाएं हुईं लेकिन नैनो का कद जिस तरह कतर रहा है उसे देखते हुए इन परियोजना वालों की सांस थम गई है। रतन टाटा के लिए साणंद मुहम्‍मद बिन तुगलक का दौलताबाद साबित हो रहा है। टाटा ने गुजरात के साणंद में नैनो का सालाना ढाई लाख यूनिट की क्षमता वाला संयंत्र लगाया, जिसे बढ़ाकर पांच लाख करने का इरादा भी था। लेकिन अब साणंद दौलताबाद बन रहा है। पहले नैनो कार में आग लगने की घटनाएं और अब इसकी बिक्री को लगे जोरदार झटके ने उनके खास सपने को चूरचूर कर दिया है। टाटा से भी ज्‍यादा करंट तो नैनो के वेंडरों को लगा है जिनकी फैक्‍टरियों में उत्‍पादन ही नहीं है और सारे लोग सुस्‍ता रहे हैं। नैनो के कारखाने में काम करने वाले मजदूरों में से 80 फीसदी को बाहर का रास्‍ता दिखा दिया गया है।

आम आदमी की इस कार की बीते नवंबर में बिक्री रही केवल 508 कार। जबकि, इस साल जुलाई में नैनो की बिक्री नौ हजार कार थी। नैनो को दु‍पहिया वाहनों के विकल्प के तौर पर पेश किया गया था, लेकिन ऐसा नहीं हो सका। सोसायटी आफ इंडिया आटोमोबाइल मैनुफैक्चरर्स के आंकड़ों के मुताबिक नवंबर के दौरान देश में मोटरसाइकिलों की बिक्री में 15. 61 फीसदी की बढ़ोतरी हुई। टाटा घराना अपने वेंडरों को सिर्फ दिलासा देने की ही स्थिति में बचा है। वेंडरों से कहा जा रहा है उम्‍मीद पर टिके रहिए। पूरी दुनिया उम्‍मीद पर टिकी हुई है। कभी न कभी तो बिक्री बढ़ ही जाएगी। टाटा घराना इस कार की बिक्री को बढ़ाने के लिए नया फाइनेंशियल पैकेज लेकर आया है। लेकिन जब मारुति 800 की तुलना में लंबाई में आठ फीसदी छोटी लेकिन अंदर से 21 फीसदी ज़्यादा जगह वाली यह क्‍या सिर्फ फाइनेंशियल पैकेज के दम पर आम आदमी के घर पहुंच जाएगी।

मुफ्त में तो इसका वितरण नहीं होगा और अब जब बजाज एवं निसान भी छोटी कार के मैदान में उतरने जा रहे हों तो बाजार में कब्‍जा जमाना आसान नहीं होगा। इसके अलावा पेट्रोल एवं डीजल के बढ़ते दामों से निपटने के लिए इलेक्ट्रिक कारों की बाढ़ आने वाली है तो नैनो लखटकिया के बजाय हजारिया न रह जाए। नैनो के दाम की 90 फीसदी राशि अब कर्ज के रुप में सस्‍ती दर पर दी जाएगी और इसका वारंटी समय भी बढ़ाकर चार साल किया गया है। साथ ही रखरखाव के अनुबंध के लिए 99 रुपए महीना ही वसूल किया जाएगा। और तो और अब यह तक कह दिया कि डाउन पेमेंट करने की भी जरुरत नहीं है। बस शो रुम में आओ, पहली किश्‍त चुकाओ, कार लेकर चलते बनो। साणंद से जो सच्‍चाई समाने आ रही है उसके मुताबिक अगले महीने जनवरी में भी नैनो का उत्‍पादन बढ़ने के कोई आसार नहीं हैं। टाटा घराना हर महीने 15 हजार से ज्‍यादा नैनो बेचना चाहती है लेकिन ग्राहक ही गायब हो गए हैं। देश का कार बाजार जब 25-30 फीसदी की बढ़ोतरी दर्ज कर रहा है तो नैनो (जिसका शाब्दिक अर्थ है सूक्ष्म या अति सूक्ष्म) का हाल यह न हो जाए कि इसे देखने के लिए केवल कंपनी के शोरुम पर ही जाना पड़े। (www.moltol.in से साभार)

December 21, 2010

प्‍याज न खाने से दस लाख लोग मरे

हिंदुस्‍तान में इस समय भगवान से ज्‍यादा नाम प्‍याज का भजा रहा है। हर समाचार पत्र, न्‍यूज वेबसाइट और टीवी चैनलों में परोसी जा रही खबरों में प्‍याज राडिया पर लीड बनाता जा रहा है। राडिया, राजा, टाटा दबते जा रहे हैं प्‍याज के बोझ और भाव के नीचे। न्‍यूज माध्‍यम और राजनेताओं को अचानक आम आदमी याद आ रहा है। गरीब हिंदुस्‍तान के लोग प्‍याज और रोटी खाकर दिन गुजार रहे हैं लेकिन समझ नहीं आ रहा कि अचानक देश के सारे न्‍यूज माध्‍यम वालों को गरीब आदमी कहां से याद आ गया। गरीब तो इतना दब चुका है कि प्‍याज से रोटी खाना तो उसने कभी का छोड़ दिया और गांव वाले भी शहरियों की तरह प्रोग्रेस कर रहे हैं। बल्कि शहर वाले हर खाने में प्‍याज चाहते हैं, प्‍याज की कचोरियां, प्‍याज के पकौड़े से लेकर पता नहीं कितने व्‍यंजनों में प्‍याज चट कर रहे हैं।

अभी कुछ साथियों से बात हो रही थी कि ऐसा कहीं सुना है कि प्‍याज न खाने से लोग मर गए हों या प्‍याज न खाने से बीमार पड़ गए हो और अस्‍पतालों के सामने मरीजों की लंबी कतारें लगी हो। फिर प्‍याज पर हायतौबा क्‍यों। मत खाइए, अपने आप दुकानदार हाथ जोड़कर सस्‍ता बेचते नजर आएंगे। लेकिन अपने यहां राजनीतिक लाभ लेने के लिए विपक्ष वाले सत्ता पक्ष को प्‍याज के माध्‍यम से राजनीति के खेल में शह मात देना चाहते हैं। मैं खुद प्‍याज कभी नहीं खाता लेकिन आज तक ऐसा नहीं लगा कि प्‍याज न खाने से बीमार पड़ गया होऊं या प्‍याज के रस के इंजेक्‍शन लगवाने पड़े हों। प्‍याज पर टीवी एंकर हल्‍ला मचा रहे हैं। इनके टेबल पर 40 किलो प्‍याज रख देने चाहिए, ले खाता जा और खबर पढ़ता जा। जब पूरे हो जाए तो बोलना, 40 किलो और भेज देंगे।

अब पाकिस्‍तान से प्‍याज अमृतसर पहुंच गया है। जागो, बापूओ, बाबाओं, यह तो मुस्लिम प्‍याज है। टीवी पर सुबह सुबह जोर से चिल्‍लाना शुरु करो कि सनातन धर्म खतरे में है। हिंदूओं का धर्म भ्रष्‍ट करने के लिए यह मुस्लिम प्‍याज आ गया। हम तो सारे मुस्लिम बन जाएंगे। हे राम, हे राम। लेकिन सर्दी के मौसम में कोई इसे हे रम न पढ़ ले। बाबा लोग अपनी सर्दी भगाने के लिए हे राम की जगह रम का सेवन न करने लग जाएं क्‍योंकि इन बाबाओं की दुकान के स्‍वामी राजा इंद्र तो सोमरस के प्‍यासे हैं। लेकिन खैरियत है कि यह प्‍याज से नहीं बनता।

आम हिंदुस्‍तानी को दाल, हरी सब्जियां और अन्‍य सब्जियां जिस भाव पर आज मिल रही है उस पर हल्‍ला नहीं हो रहा। सारे न्‍यूज माध्‍यमों को यह मसला दिखाई नहीं दे रहा क्‍योंकि प्‍याज से आए आंसू में यह मसला धुंधला हो गया है। फलों के भाव आसमान पर हैं। खाद्य महंगाई दर बढ़ाने में प्‍याज का उतना हाथ नहीं है जितना दाल, हरी सब्जियों का है। कोई भी सब्‍जी सामान्‍य कस्‍बे में 60 रुपए से किलो से कम पर नहीं है। दालें भी महंगी है और फल तो ऐसा कहना चाहिए, फल लागे अति दूर। सरकार और मीडिया को यह दिखाई नहीं दे रहा। सब्जियों के निर्यात को रोकने पर ध्‍यान नहीं गया केवल प्‍याज दिखाई दे गया, वह भी काफी महंगा और हल्‍ला होने के बाद।

यही हल्‍ला कुछ समय बाद चीनी पर मचने वाला है। सरकार को चीनी मिलों को फायदा कराए लंबा समय हो गया तो अचानक इनके भले के लिए कुछ करने की सोची। सोचा आम आदमी तो रोता फिरेगा और जब खूब रो लेगा तब चीनी के बारे में सोचेंगे, फिलहाल तो उसे निचोड़ लें। पांच लाख टन चीनी का निर्यात, चाहे देश में ही इसकी खपत खूब हो, लेकिन दूसरे देशों को तो फायदा कराओ। राशन की चीनी यानी लेवी चीनी का दाम बढ़ाना और पहले की तरह चीनी वायदा को खोलने का वादा करना, चीनी को कड़वी बनाने के लिए काफी है। चीनी वायदा से फायदा किसे होता है जो महीने में दो से चार किलो चीनी खाता है उसे या चीनी मिलों को अथवा कारोबारियों को, यह हर कोई जानता है। लेकिन मीडिया सो रहा है, पहले चीनी 38 रुपए हो जाने दो, फिर हल्‍ला मचाएंगे ताकि तब तक न्‍यूज तैयार हो जाएगी। बाइट के लिए लोग मिल जाएंगे। चीनी के दाम रोज बढ़ रहे हैं लेकिन जनपथ पर बैठे शहंशाह दम साध्‍ो हुए हैं। भागने दो चीनी को फिर जनता को कहेंगे कि हम नकेल कस रहे हैं। जांच करेंगे कि किसने पांच लाख टन चीनी देश से बाहर जाने दी। चलो चली गई तो अब क्‍या करें। हम 15 लाख टन चीनी आयात कर लेते हैं, चिंता क्‍यों करते हो। चलो जनपथ तुम्‍हारा मुंह मीठा करवा रहा है, अब तो हल्‍ला मचाना बंद करो। वोट देने का टैम आ रहा है, हमें ही वोट देना क्‍योंकि आम आदमी को निचोड़ने के लिए हम ही बने हैं, हमसे बेहतर कोई दूसरा हो तो बताना। हम निचोड़ते हैं तो रस भी भरते हैं। भिगोया, धोया, निचोडा और सुखाया, हो गया आम आदमी खुश।

December 18, 2010

मुरली का सीमेंट प्‍लांट बिकने की खबर थी झूठी!

मुरली इंडस्‍ट्रीज के शेयरों पर पिछले समय दांव लगाकर बड़ा पैसा कमाने की इच्‍छा रखने वाले निवेशकों को जोरदार झटका मैक्सिको की सीमेंट कंपनी सीमेक्स सैब द सीवी ने दिया है। इस कंपनी ने यह साफ कर दिया है कि उसने कभी भी मुरली इंडस्‍ट्रीज के सीमेंट प्‍लांट को खरीदने के लिए बातचीत तक नहीं की। कंपनी ने दो टूक शब्‍दों में कहा है कि सीमेक्‍स न तो इस सौदे में शामिल थी और न ही है। मीडिया में आई खबर के बाद सीमेक्‍स ने अपनी स्थिति साफ कर दी है। जबकि, मुरली इंडस्‍ट्रीज अब चुप है। सेबी ने पिछले दिनों इस कंपनी के प्रमोटरों को एक पुराने मामले में शेयर बाजार में अपने शेयर बेचने से रोक दिया है।

बाजार के कुछ खिलाडि़यों का कहना है कि मुरली इंडस्‍ट्रीज के प्रमोटरों और इस शेयर में काम कर रहे कुछ ऑपरेटरों ने मिलकर मीडिया में यह खबर परोसवाई की मैक्सिको की सीमेंट कंपनी ने उसके प्‍लांट को खरीदने की तैयारी कर रही है। इस खबर के बाद मुरली इंडस्‍ट्रीज के शेयरों को पंख लग गए। निवेशकों में मुरली इंडस्‍ट्रीज के शेयर खरीदने के लिए अफरातफरी मच गई और लगा जैसे इस कंपनी के शेयर नहीं लिए तो बहुत कुछ उनके हाथ से छूट जाएगा। इसी का नतीजा रहा कि यह शेयर 25 नवंबर 2010 को 118.90 रुपए के उच्‍च स्‍तर पर पहुंच गया। जबकि यह 16 दिसंबर 2010 को 64.20 रुपए पर बंद हुआ। हालांकि, इसका एक सप्‍ताह का निचला स्‍तर 50 रुपए रहा था।

अनेक छोटे निवेशकों का कहना है कि मीडिया ने यह खबर बगैर जांच परख के खूब चलाई जिसकी वजह से उनका खूब नुकसान हुआ। तीन सूत्रों के हवाले से लिखी इस खबर में शायद एक भी सूत्र सही नहीं था या ईमानदार नहीं था। खबर में तो मुरली इंडस्‍ट्रीज और सीमेक्‍स के बीच सौदे के लिए सलाह देने वाले दिग्‍गजों के नाम तक बताए गए हैं लेकिन इन दिग्‍गजों ने कई दिन बीत जाने के बाद भी यह स्‍पष्‍टीकरण नहीं किया कि सीमेक्‍स झूठ बोल रही है या वे इस सौदे में उनके सलाहकार नहीं थे। अथवा उनकी क्‍या पोजीशन थी। सेबी को इस खबर की सच्‍चाई की तह में जाना चाहिए और दोषियों के खिलाफ कड़ी कार्रवाई करनी चाहिए।

ताज्‍जुब यह है कि सीमेक्‍स की मनाही के बावजूद मुरली इंडस्‍ट्रीज के प्रबंध निदेशक नंदलाल मालू यह कहते फिर रहे हैं कि अंतरराष्‍ट्रीय कंपनी सीमेक्‍स के साथ उनकी बातचीत चल रही है और यह सौदा 180-200 अमरीकी डॉलर प्रति टन पर होगा जो बेहतर भाव कहा जा सकता है। देश के एक आर्थिक अखबार में मुरली इंडस्‍ट्रीज की यह खबर इस तरह थी:

मुरली सीमेंट खरीदने की तैयारी में मैक्सिको की सीमेक्स

मैक्सिको की सीमेंट कंपनी सीमेक्स सैब द सीवी भारतीय कंपनी मुरली सीमेंट को करीब 55 करोड़ डॉलर में खरीदने की तैयारी में है। यूरोपीय कंपनियों लाफार्ज और होलसिम के बाद सीमेक्स दुनिया की तीसरी सबसे बड़ी सीमेंट कंपनी है। तीन सूत्रों ने बताया कि कई महीनों तक मुरली सीमेंट का ड्यू डिलिजेंस करने के बाद सीमेक्स ने अंतिम बोली लगाई है। सूत्रों के मुताबिक, पहले लाफार्ज और दुनिया की पांचवें नंबर की सबसे बड़ी सीमेंट कंपनी इटालसीमेंटी भी हिस्सेदारी लेने के लिए मुरली सीमेंट से बातचीत कर रही थीं। इक्विटी ब्रोकरेज फर्म मोतीलाल ओसवाल की इनवेस्टमेंट बैंकिंग यूनिट इस सौदे में मुरली सीमेंट की मूल कंपनी नागपुर की मुरली इंडस्ट्रीज को सलाह दे रही है। इससे पहले इस साल यह इनवेस्टमेंट बैंकिंग यूनिट श्री रेणुका शुगर के ब्राजीलियाई अधिग्रहण में भी सलाह दे चुकी है। सूत्रों ने बताया कि मैक्वेरी कैपिटल और जेफरीज इंडिया भी मुरली के साथ काम कर रही हैं, जबकि बैंक ऑफ अमेरिका-मेरिल लिंच सीमेक्स को सलाह दे रही है। स्विट्जरलैंड की सीमेंट कंपनी होलसिम द्वारा 2005 में एक आकर्षक सौदे में एसीसी सीमेंट और अंबुजा सीमेंट का नियंत्रण हासिल करने के बाद यह भारतीय सीमेंट इंडस्ट्री का सबसे बड़ा सौदा होगा। बाद में, होलसिम ने 2006 की शुरुआत में गुजरात अंबुजा सीमेंट में शेखसरिया और नेवतिया घरानों का हिस्सा खरीदा था। मुख्य रूप से मुरली इंडस्ट्रीज का नाम कागज और कृषि संबंधी कारोबार के लिए जाना जाता है। माना जा रहा है कि कंपनी इस सौदे के जरिए सीमेंट कारोबार से पूरी तरह किनारा करने की तैयारी में है। महाराष्ट्र के चंदपुर में 30 लाख टन क्षमता के कारखाने के अलावा मुरली ने राजस्थान और कर्नाटक में दो यूनिट शुरु करने की घोषणा की थी। कंपनी की प्रस्तावित दोनों यूनिटों की उत्पादन क्षमता 30-30 लाख टन है। चंदपुर कारखाने की तरह इन दोनों यूनिट में अपने इस्तेमाल के लिए 50 मेगावॉट के बिजली कारखाने भी हो सकते हैं। इन दोनों यूनिट के लिए कोयला आपूर्ति के लंबी अवधि के करार भी हो सकते हैं। सीमेंट उद्योग के अधिकारियों के मुताबिक, इन कारखानों के लिए मुरली ने उपकरणों के ऑर्डर अभी नहीं दिए हैं। कंपनी पर फिलहाल 600 करोड़ रुपए का कर्ज है और इसका डेट-इक्विटी अनुपात 2.5:1 है। विश्लेषकों का कहना है कि यह सौदा मुरली इंडस्ट्रीज के सीमेंट कारोबार का मूल्यांकन 180 डॉलर प्रति टन से अधिक के एंटरप्राइज वैल्यू पर कर सकता है। नाम जाहिर न करने की शर्त पर एक इंस्टीट्यूशनल ब्रोकरेज फर्म के एक विश्लेषक ने कहा, '30 लाख टन क्षमता और 40 फीसदी यूटिलाइजेशन वाले कारखाने का सौदा महंगा है।' अप्रैल में फ्रांस की विकैट ने आंध्र प्रदेश की 25 लाख टन क्षमता वाली सीमेंट कंपनी भारती सीमेंट में 51 फीसदी हिस्सेदारी खरीदी थी। इस सौदे का वित्तीय विवरण सार्वजनिक नहीं किया गया था, लेकिन सूत्रों के मुताबिक 200 डॉलर प्रति टन के वैल्यूएशन के साथ यह सौदा 50 करोड़ डॉलर में हुआ था। दुनिया की बड़ी सीमेंट कंपनियों में अधिग्रहण और विलय के मोर्चे पर सीमेक्स सबसे आक्रामक कंपनी है। 2005 में इसने लंदन के आरएमसी समूह को 5.8 अरब डॉलर में खरीदा था और उसके बाद ऑस्ट्रेलिया के रिकंर ग्रुप का अधिग्रहण लगभग 14.2 अरब डॉलर में किया। सीमेक्स के कर्मचारियों की संख्या 50,000 से ज्यादा है और 2009 में इसकी बिक्री 15 अरब डॉलर थी। नाम जाहिर न करने की शर्त पर एक वरिष्ठ इनवेस्टमेंट बैंकर ने कहा, 'वैश्विक स्तर पर भारत में अधिग्रहण करने में कंपनियों की काफी रुचि है, लेकिन यहां बहुत कम विक्रेता हैं।'(www.moltol.in से साभार)