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March 29, 2011

दानवीर कर्ण और वारेन बफेट एंड बिल गेटस

दो अमरीकी महाधनाढ़य वारेन बफेट और बिल गेटस भारतीयों को दान की महिमा एवं दान करने के लिए प्रेरित करने पधारे। असल में तो सारा खेल इस दान महिमा के पीछे उनके बिजनैस का ही रहता है। वारेन बफेट को सुनने के लिए साफ कहा गया था कि पहले एक बीमा पॉलिसी खरीदो तो ही उनके कार्यक्रम में आ सकते हैं। दूसरा, बिल गेटस को आम आदमी जानता ही है कि दुनिया भर में जो कंप्‍यूटर चल रहे हैं वे अब उन्‍हें घर बैठे बिठाए खूब कमाई दे रहे हैं। कल की कोई चिंता नहीं है।

वारेन बफेट भारतीयों को दान के लिए प्रेरित करते हुए भारत सरकार को भी इस बात के लिए प्रेरित कर रहे हैं कि बीमा क्षेत्र में सीधे विदेशी धन की सीमा 26 फीसदी को खत्‍म कर सौ फीसदी कर दी जाए ताकि उनकी दुकान यहां अच्‍छी तरह जम सके। बिल गेटस के बारे में आम आदमी जानता ही है कि जो कंप्‍यूटर चल रहे हैं वे दिन रात उनकी तिजोरियां भर रहे हैं। भारतीय उद्योगपति इस समय सम्‍पत्ति सर्जन कर रहे हैं जबकि बफेट एवं गेटस यह काम कर चुके हैं। हालांकि, भारतीयों को दान की महिमा के बारे में बताने की जरुरत नहीं है। भारतीय उद्योगपति कारोबार के अलावा दान पुण्‍य का कार्य ढोल नगाड़ा बजाए बगैर कर रहे हैं।

दानवीर कर्ण से लेकर म‍हर्षि दधीचि इस देश में जन्‍मे हैं। इस देश में अनेक राजा-महाराजा, रईस पैदा हुए हैं जिन्‍होंने परोपकार के लिए अपना सब कुछ लूटा दिया। आज भी देश में अनेक ऐसे लोग हैं जो यह कार्य कर रहे हैं लेकिन वे इसका ढोल नहीं पीट रहे। दान के बारे में कहा गया है कि दान वही उत्तम होता है जो सही पात्र को दिया जाए और दाएं हाथ से दान दिया जाए तो बाएं हाथ तक को पता न चले। बाएं हाथ से दान दिया जाएं तो दाएं हाथ तक को पता न चले। लेकिन अंतरराष्‍ट्रीय धनाढ़य भारतीय संस्‍कृति और आदर्श नहीं जानते। वे यह समझते हैं कि एक फाउंडेशन बनाओं और दान का ढोल इतना जोर से पीटो कि लगे तीनों लोक में इनसे बड़ा दानी पैदा नहीं हुआ। अब जानिए आप दानवीर कर्ण की कथा:

महाभारत का युद्ध चल रहा था। सूर्यास्त के बाद सभी अपने-अपने शिविरों में थे। उस दिन अर्जुन ने कर्ण को पराजित कर दिया था। इसलिए वह अहंकार में चूर थे। वह अपनी वीरता की डींगें हांकते हुए कर्ण का तिरस्कार करने लगे। यह देखकर श्रीकृष्ण बोले-“पार्थ! कर्ण सूर्यपुत्र है। उसके कवच और कुंडल दान में प्राप्त करने के बाद ही तुम उस पर विजय पा सके हो अन्यथा उसे पराजित करना किसी के वश में नहीं था। वीर होने के साथ ही वह दानवीर भी हैं। उसके समान दानवीर आज तक नहीं हुआ।”

कर्ण की दानवीरता की बात सुनकर अर्जुन तिलमिला उठे और तर्क देकर उसकी उपेक्षा करने लगा। श्रीकृष्ण अर्जुन की मनोदशा समझ गए थे। वे शांत स्वर में बोले-“पार्थ! कर्ण रणक्षेत्र में घायल पड़ा है। तुम चाहो तो उसकी दानवीरता की परीक्षा ले सकते हो।” अर्जुन ने श्रीकृष्ण की बात मान ली। दोनों ब्राह्मण के रूप में उसके पास पहुंचे। घायल होने के बाद भी कर्ण ने ब्राह्मणों को प्रणाम किया और वहां आने का उद्देश्य पूछा। श्रीकृष्ण बोले-“राजन! आपकी जय हो। हम यहां भिक्षा लेने आए हैं। कृपया हमारी इच्छा पूर्ण करें।”

कर्ण थोड़ा लज्जित होकर बोला-“ब्राह्मण देव! मैं रणक्षेत्र में घायल पड़ा हूं। मेरे सभी सैनिक मारे जा चुके हैं। मृत्यु मेरी प्रतीक्षा कर रही है। इस अवस्था में भला मैं आपको क्या दे सकता हूं?” “राजन! इसका अर्थ यह हुआ कि हम खाली हाथ ही लौट जाएं? ठीक है राजन! यदि आप यही चाहते हैं तो हम लौट जाते हैं। किंतु इससे आपकी कीर्ति धूमिल हो जाएगी। संसार आपको धर्मविहीन राजा के रूप में याद रखेगा।” यह कहते हुए वे लौटने लगे। तभी कर्ण बोला-“ठहरिए ब्राह्मणदेव! मुझे यश-कीर्ति की इच्छा नहीं है, लेकिन मैं अपने धर्म से विमुख होकर मरना नहीं चाहता। इसलिए मैं आपकी इच्छा अवश्य पूर्ण करूंगा।

कर्ण के दो दांत सोने के थे। उन्होंने निकट पड़े पत्थर से उन्हें तोड़ा और बोले-“ब्राह्मण देव! मैंने सर्वदा स्वर्ण(सोने) का ही दान किया है। इसलिए आप इन स्वर्णयुक्त दांतों को स्वीकार करें।” श्रीकृष्ण दान अस्वीकार करते हुए बोले-“राजन! इन दांतों पर रक्त लगा है और आपने इन्हें मुख से निकाला है। इसलिए यह स्वर्ण जूठा है। हम जूठा स्वर्ण स्वीकार नहीं करेंगे।” तब कर्ण घिसटते हुए अपने धनुष तक गए और उस पर बाण चढ़ाकर गंगा का स्मरण किया। तत्पश्चात बाण भूमि पर मारा। भूमि पर बाण लगते ही वहां से गंगा की तेज जल धारा बह निकली। कर्ण ने उसमें दांतों को धोया और उन्हें देते हुए कहा-“ब्राह्मणों! अब यह स्वर्ण शुद्ध है। कृपया इसे ग्रहण करें।

तभी कर्ण पर पुष्पों की वर्षा होने लगी। भगवान श्रीकृष्ण और अर्जुन अपने वास्तविक स्वरूप में प्रकट हो गए। विस्मित कर्ण भगवान श्रीकृष्ण की स्तुति करते हुए बोला-“भगवन! आपके दर्शन पाकर मैं धन्य हो गया। मेरे सभी पाप नष्ट हो गए प्रभु! आप भक्तों का कल्याण करने वाले हैं। मुझ पर भी कृपा करें।” तब श्रीकृष्ण उसे आशीर्वाद देते हुए बोले-“कर्ण! जब तक यह सूर्य, चन्द्र, तारे और पृथ्वी रहेंगे, तुम्हारी दानवीरता का गुणगान तीनों लोकों में किया जाएगा। संसार में तुम्हारे समान महान दानवीर न तो हुआ है और न कभी होगा। तुम्हारी यह बाण गंगा युगों-युगों तक तुम्हारे गुणगान करती रहेगी। अब तुम मोक्ष प्राप्त करोगे।” कर्ण की दानवीरता और धर्मपरायणता देखकर अर्जुन भी उसके समक्ष नतमस्तक हो गया। क्‍या वारेन बफेट और बिल गेटस दानवीर कर्ण से तो बड़े नहीं ही है क्‍योंकि वे जहां दान देते हैं वहां अपने कारोबारी लाभों को जरुर देखते हैं, जबकि कर्ण ने कोई लालसा नहीं रखी थी। यदि वह चाहता तो कृष्‍ण से जीवन मांग सकता था। आम भारतीय घरानों में बुजूर्ग दान और सहायता की जो शिक्षा देते हैं वह अमरीकी धनाढ़यों की शिक्षा से बेहतर होती है।

March 20, 2011

तय है आज लीबिया...कल कश्‍मीर

अमरीका ने अफगानिस्‍तान और इराक से शायद कुछ सबक नहीं सीखे। इराक में सद्दाम हुसैन को सत्ता से हटाने के लिए समूची दुनिया से सब कुछ झूठ बोला गया। इराक में परमाणु हथियार है, जैविक हथियार है, सद्दाम सब को मार देंगे। इराक में परमाणु निरीक्षण के बहाने उस पर झूठे आरोप लगाए गए। सारे के सारे अंतरराष्‍ट्रीय निरीक्षक अमरीका की रोटियों पर पलने वाले दलाल थे। यूरोप के इशारों पर नाचने वाले भांड थे। इराक की बेबिलोन संस्‍कृति वाले पूरे इराक को ऐसी आग में झोंक दिया, जो कभी नहीं बुझ सकती। बरसों लगेंगे, फिर से इराक में अमन चैन कायम करने के लिए। अफगानिस्‍तान के राष्‍ट्रपति हमीद करजई तो अमरीका की बैसाखी के बगैर दो दिन नहीं चल सकते। ता‍लिबान आज भी उन्‍हें कुर्सी से उतारकर भाग खड़ा होने पर मजबूर कर देगा।

बराक ओबामा के आने के बाद यह आस बंधी थी कि दुनिया में अमन चैन लौटेगा। मार्टिन लूथर किंग से जिस व्‍यक्ति की तुलना की जा रही थी, एक अश्‍वेत जिस तरह से अमरीका का राष्‍ट्रपति बना और वाही वाही की जा रही थी, वह सब अब खत्‍म हुआ। दुनिया को भाषण देने की आड़ में शायद एक कुटिल चाल तैयार की जा रही थी। दुनिया के प्राकृतिक संसाधनों पर कब्‍जा करने और मध्‍य पूर्व और अफ्रीका के कुछ हिस्‍सों को कमजोर कर एशियन टाइगर से बुरी हालत करने के लिए अमरीकी बेताब नजर आ रहे हैं।

टयूनिशिया में सत्ता परिवर्तन का चक्र भी अमरीका की देन है। विद्रोही इसने ही खड़े किए। फिर यह प्रयोग इजिप्‍त में दोहराया गया। और अब लीबिया निशाने पर है। यह सही है कि जुल्‍म का विरोध होना चाहिए और जनता के साथ कुछ भी गलत हो रहा हो तो उस देश की जनता को ही खड़ा होना चाहिए एवं लड़ाई लड़नी चाहिए लेकिन दूसरे देशों का हस्‍तक्षेप नहीं होना चाहिए। लेकिन लीबिया के सहारे अपनी अर्थव्‍यवस्‍था को मजबूत करने, मध्‍य पूर्व व अफ्रीका में पकड़ बनाने एवं लीबिया के तेल को हड़पने के लिए अमरीका ने अपने चमचा देश ब्रिटेन, फ्रांस को साथ लेकर उस पर हमला बोल दिया। संयुक्‍त राष्‍ट्र संघ की लाचारी देखकर लगता है कि यह संघ अमरीका जैसे गुंडे देशों का संघ बन गया है जो जब चाहे मनमाने प्रस्‍ताव पास करा सकता है। जब चीन, भारत सहित पांच देशों ने लीबिया के खिलाफ लाए गए प्रस्‍ताव पर मतदान में हिस्‍सा नहीं लिया तो उनकी बात को अनसुना कर प्रस्‍ताव पारित क्‍यों कर दिया गया।

फ्रांस ने पहल की लड़ाई की और सबसे पहले हमला भी उसने किया। वह शायद भूल गया है कि नस्‍त्रोदामस जैसे भविष्‍यवेता ने अगली लड़ाई फ्रांस की धरती पर ही लडे जाने की भविष्‍यवाणी की थी। अमरीका व यूरोप क्‍यों इस्‍लाम धर्म वालों को भड़काने की कार्रवाई करते रहते हैं। हर इस्‍लामिक राष्‍ट्र पर हमला। इस्‍लाम वालों ने दुखी होकर ही अल कायदा जैसे संगठन बनाए जो हर संभव लड़ाई लड़ रहे हैं। गद्दाफी को क्‍यों यह कहना पड़ा कि वे अल कायदा से दोस्‍ती कर सकते हैं। अमरीका और यूरोप का ईसाई समुदाय शायद इस्‍लाम वालों को चैन से जीने नहीं देना चाहता। जबकि वे ईसा मसीह के सिद्धांतों पर खुद नहीं चल रहे।

लीबिया का तेल हड़पने के लिए बैचेन अमरीका और यूरोप पर विश्‍व समुदाय को मिलकर आवाज उठानी चाहिए। खुद अरब जगत को पहल करनी चाहिए लेकिन सऊदी अरब ने पूरे मध्‍य पूर्व देशों के साथ धोखा किया है। अमरीका को अपने यहां सैनिक अड्डे बनाकर दिए है। लीबिया को तबाह करने के षडयंत्र में शामिल है। सऊदी अरब खुद चाहता है कि इराक के बाद ईरान तबाह हो जाए। लेकिन वह यह भूल रहा है कि यही आग उसे भी खत्‍म कर देगी।

अमरीका की संयुक्‍त राष्‍ट्र संघ में चल रही दादागिरी को सहने से अच्‍छा है विश्‍व के कई सदस्‍य देश इससे अपना नाता तोड़ नया संघ बना ले। अमरीका को विश्‍व समुदाय से अलग थलग करने के प्रयास किए जाने चाहिए। लेकिन हिम्‍मत नहीं है किसी में। हमारे देश में सरकार को बचाने के लिए चार सांसदों को 40 करोड़ दिए जाने का जो खुलासा हुआ और भाजपा के महान नेता लाल कृष्‍ण आडवाणी की परमाणु संधि पर दोगलेपन की जो पोल खुली उससे पता चलता है कि अमरीका अपनी दबंगता हमारी संसद में चलाता है। वित्त मंत्री कौन बनना चाहिए, कौन नहीं और प्रणब मुखर्जी क्‍यों बन गए, वे क्‍या करेंगे, किसके खास है, यह पूछने वाला अमरीका होता कौन है। हमारा देश है, हम चाहे जो फैसले लें, अमरीकी गुंडागर्दी को क्‍यों सहे।

जापानी परमाणु बिजली संयंत्रों की बुरी दिशा से कोई सबक लिए बगैर हमारी सरकार जैतापुर में परमाणु बिजली संयंत्र लगाने पर अड़ी हुई है। आम आदमी के विरोध को दबाया जा रहा है। हर नेता वहां जा जाकर लोगों को समझा रहा है कि यह संयंत्र लगने दो। संयंत्र की आड़ में भ्रष्‍टाचार भी तो करना है। परमाणु बिजली घर लगाओ, ताकि यूरोप का फायदा हो, अमरीका को लाभ हो। ईंधन के लिए इन्‍हीं देशों पर निर्भर रहे, जब चाहे तब ईंधन दें और चाहे तो न दें। करोड़ों का कारोबार यूरोप व अमरीका को मिल गया।

देश के मौजूदा शासकों में यह देखना चाहिए कितने नेता भारत के बजाय अमरीकी व यूरोपीय हित चिंतक हैं। देश हमारा, चिंता अमरीका व यूरोप की। जमीन से ज्‍यादा बाजार की लड़ाई में भारत भी यूरोप व अमरीकी कंपनियों का बाजार बन गया है। आज किसी नेता में दम नहीं है कि वह कोका कोला जैसी कंपनी का बोरिया बिस्‍तर गोल कर दें। इन कंपनियों के बिस्‍तर गोल करके देखों, अमरीका व यूरोप भारत को भी लीबिया,ईरान बनाने से परहेज नहीं करेंगे। ईरान के साथ देश की कंपनी रिलायंस के संबंध को लेकर अमरीका ने एतराज किया, म्‍यामांर से भारत के संबंधों पर उसे परेशानी है, लेकिन हमारी सरकार कुछ करने की बात तो छोडिए जोर से चिल्‍ला भी न सकी। ऐसी ही कोई बात चीन से करके देखिए मुंह तोड़ जवाब देता। चीनी सरकार कैसी भी हो, उसकी कई बार आलोचना भी होती है लेकिन वह अपने देश के हितों से बड़ा कुछ नहीं देखती यह उसकी खूबी है। चीनी लोग अपने देश से प्‍यार करते हैं। चीनी सरकार अपनी सरकार की तरह लाचार नहीं है।

अमरीका व यूरोप ने इराक, अफगानिस्‍तान, इजिप्‍त, लीबिया में जो आग लगाई वह देर सवेर भारत भी पहुंचेगी। पाकिस्‍तान तो चाहता ही है कि कश्‍मीर के मामले पर अमरीका हस्‍तक्षेप करे। लेकिन वह कर नहीं रहा, इसका मतलब यह न निकालें कि अमरीका हमारे पक्ष में है। अमरीका किसी के पक्ष में नहीं है। जब उसका मतलब आएगा वह कश्‍मीर मामले पर ही हमारा चैन छिन लेगा। आओ, तुम्‍हारी लड़ाई सुलझा दूं के साथ अमरीका व उसके यूरोपीयन चमचे भारत आ धमकेंगे और कश्‍मीर लीबिया बना नजर आएगा। यह सब जानते हैं कि लीबिया में विद्रोह के लिए हथियार और पैसे आम जनता ने नहीं अमरीका व ब्रिटेन और फ्रांस ने दिए हैं। इजिप्‍त में भी इन्‍होंने ही धन बांटा था। कल कश्‍मीर में भी ये ही देश धन बांटकर जन विद्रोह खड़ा करेंगे और जब हमारी सरकार वहां कानून का डंडा लेकर खड़ी होगी तो अमरीका यही कहेगा, भारत सरकार कश्‍मीर की आवाज को न दबाएं। विद्रोहियों पर हमले न करें लेकिन तब कुछ नहीं हो सकेगा। जागो, समय रहते जागो, अन्‍यथा आज लीबिया, कल कश्‍मीर तय है।

March 18, 2011

सुप्रीम इंफ्रास्‍ट्रक्‍चर: बड़ी सोच का बड़ा नतीजा

यदि आज कार्पोरेट इंडिया के बड़े दिग्गज प्रेमजी, मित्तल और नारायण मूर्ति आदि कुछ दान करते हैं तो वह अखबारों और टीवी चैनलों की हैडलाइन बन जाती है। अब हम थोड़ा पीछे चलते हैं। जयपुर के 45 वर्षीय स्व. चन्द्रभान शर्मा, जो एक स्वतंत्रा सेनानी थे, ईस्ट इंडिया कंपनी से बचने के लिए जयपुर से पलायन कर मुंबई के पवई आ गए। सर मोहम्मद यूसुफ से उन्होंने अंधेरी से लेकर कांजुरमार्ग तक 4600 एकड़ जमीन खरीदी। 1947 में जब देश आजाद हुआ तब स्व. शर्मा चाहते थे कि आईआईटी की स्थापना मुंबई में हो, इसके लिए उन्होंने मात्र एक रुपए में अपनी 1700 एकड़ जमीन इस संस्थान की स्थापना के लिए दे दी। इतना ही नहीं 170 एकड़ जमीन उन्होंने एलएंडटी को 35000 रुपए प्रति माह किराए पर दी, जो 99 साल की लीज पर है (38 साल अभी बचे हैं)। यह एक इतिहास है।

समय निकलता गया, स्व. शर्मा के पोते भवानीशंकर शर्मा ने अपने दो पुत्रों विक्रम और विकास के साथ मिलकर पवई में अपनी बिजनेस यूनिट और कार्पोरेट ऑफिस बनाया है। भवानीशंकर ने 1969 में बिजनेस के क्षेत्र में प्रवेश किया और 1980 तक वे पवई के पहाड़ी क्षेत्रों में अधिग्रहण और क्रशिंग का काम करने लगे। 1983 में उन्होंने दो पार्टनर के साथ मिलकर डामर यूनिट लगाई और पीडब्ल्यूडी, म्युनिसिपल कॉरपोरेशन व पोटर्स से सड़क कार्य के ठेके लेने लगे। जल्द ही उनके दोनों पार्टनर भारत छोड़कर चले गए, लेकिन भवानीशंकर सुप्रीम अस्फाल्ट लिमिटेड (एसएएल) के बैनर तले मुख्यत: सड़क निर्माण के छोटे-छोटे काम लगातार करते रहे। 1998 में टर्निंग प्वाइंट आया, जब मुंबई यूनिवर्सिटी से बीई सिविल की डिग्री लेकर 35 वर्षीय विक्रम ने एसएएल ज्वॉइन की। हालांकि, शुरुआत में वे रोड सैक्टर में ही अटके रहे, फिर उन्होंने बड़ी-बड़ी कंसट्रक्‍शन कंपनियों के लिए सब-कॉन्ट्रेक्टर के रूप में पुल, ड्रेनेज आदि बनाने का काम करना शुरू किया।

विक्रम के अनुसार, जिन्होंने एमएसआरडीसी के लिए अमरावती में सड़क और पुल, मुंबई में वेस्टर्न एक्सप्रेस हाईवे का निर्माण और चौड़ीकरण, मरीन ड्राइव से लेकर नरीमन प्वाइंट तक समुद्री दीवार और ट्रेटापॉड्स बिछाने जैसे बड़े काम किए, 2002 में कंपनी का नाम बदलकर सुप्रीम इंफ्रास्ट्रक्चर इंडिया लिमिटेड (एसआईआईएल) कर दिया गया। शुरुआती पांच साल यानी 2006 तक कंपनी दूसरों द्वारा लिए गए बड़े-बड़े प्रोजेक्ट में सब-कॉन्ट्रेक्टर के रूप में ही काम करती रही। लेकिन भविष्य में बड़े प्रोजेक्ट के लिए बोली लगाना और उन्हें हासिल करना हमारे लिए बहुत महत्वपूर्ण था और बड़े खेल के लिए ऐसा करना जरूरी भी। एसआईआईएल ने सदभाव इंजीनियरिंग के लिए कॉन्ट्रेक्टर के तौर पर भिवंडी-नाशिक फोर लेन हाईवे का भी निर्माण किया। इसके बाद एसआईआईएल ने पवई में रेडी मिक्स कॉन्क्रीट (आरएमसी) यूनिट की स्थापना की, जो कि उनके आगे बढ़ने में एक सीढ़ी की तरह थी। डामर और आरएमसी यूनिट का इस्तेमाल हाउस प्रोजेक्ट में हो रहा है। वर्तमान में प्रतिदिन 510 टन क्षमता वाले तीन क्रशर प्लांट, प्रति घंटे 300 टन क्षमता वाले दो डामर यूनिट, छह आरएमसी और एक वेट मिक्स प्लांट चलाने वाले विक्रम कहते हैं कि इन सब की बदौलत हमें बहुत कम दामों पर कच्चा माल आराम से मिल जाता है। कच्चे माल की सस्ती दरों पर उपलब्धता से कंपनी को तीन से चार फीसदी फीसदी मार्जिन का अतिरिक्त लाभ मिल रहा है।

वर्ष 2006-07 में 31 वर्षीय विकास ने फाइनेंस में एमबीए डिग्री हासिल करने के बाद पारिवारिक बिजनेस को ज्वॉइन किया। विक्रम-विकास की जोड़ी ने नई जमीन तलाशना शुरू की और एसआईआईएल के पुराने कौशल और मजबूत साख की बदौलत बड़े-बड़े प्रोजेक्ट्स में बोलियां लगाना शुरू किया। इसी साल कंपनी ने अपनी 25 फीसदी हिस्सेदारी बेचकर 108 रुपए प्रति शेयर के आईपीओ के जरिए 37 करोड़ रुपए जुटाए। कंपनी 190 रुपए पर लिस्टेड हुई। पिछले पांच सालों में एसआईआईएल ने काफी तेज गति से तरक्की की है। 2010 में कंपनी का राजस्व कम्पाउंडेड एनुअल ग्रोथ रेट (सीएजीआर) 63 फीसदी बढ़कर 533 करोड़ रुपए पर पहुंच गया और कंपनी को कर पश्चात 39 करोड़ रुपए का शुद्ध लाभ हुआ।

सु्प्रीम इंफ्रास्‍ट्रक्‍चर का 50 करोड़ से 500 करोड़ रुपए तक का यह सफर महज पांच सालों का है। जब से कंपनी ने अपने को सड़क, पुल, पावर ट्रांसमिशन, बिल्डिंग और अन्य क्षेत्रों में डाइवर्सीफाइड किया है, तब से इसकी तरक्की लगतार हो रही है। विकास के अनुसार एसआईआईएल की प्रगति बड़ी ही ऐतिहासिक है, पहले हम केवल बिल्डिंग, रोड और पुल जैसे छोटे प्रोजेक्ट के ऑर्डर लिया करते थे, फिर धीरे-धीरे हमनें 100 करोड़ रुपए तक के प्रोजेक्ट के लिए बोली लगाना शुरू किया। इसके तहत हमने सबसे पहले ठाणे म्युनिसिपल्टी के लिए 113 करोड़ रुपए का स्ट्रोम वाटर ड्रेन डवलपमेंट वर्क किया। इसके बाद 103 करोड़ रुपए का एनएचएआई का चित्रदुर्गा सेक्शन कार्य पूर्ण किया। इन प्रोजेक्ट की वजह से हमें अच्छा अनुभव और आत्मविश्वास मिला, जिसकी वजह से हम हाई वेल्यू प्रोजेक्ट जैसे फ्लाईओवर, रेलवे और लॉ कोस्ट हाउसिंग प्राप्त कर सके। हमने अपनी रियल एस्टेट डवलपमेंट कंपनी भी स्थापित की है।

लय में आने के बाद शर्मा बंधु अब नए क्षेत्र जैसे पावर, टीएंडडी और रेलवे के बड़े प्रोजेक्ट लेने के लिए आक्रामक रूप से बोली लगा रहे हैं। विक्रम के अनुसार इसकी वजह से कंपनी की ऑर्डर बुक पिछले 24 माह में छह गुना बढ़कर 576 करोड़ से वर्तमान में 3500 करोड़ पर पहुंच गई है। एसआईआईएल के पास पुल, रोड और रोपवे सेगमेंट में 824 करोड़ रुपए के तीन बीओटी प्रोजेक्ट हैं। इतना ही नहीं एनएचएआई से लगभग 1300 करोड़ रुपए का वर्क ऑर्डर भी हासिल हुआ है। जून 2010 में कंपनी ने पीडब्ल्यूडी के साथ एक एग्रीमेंट किया है, जिसके तहत वह 430 करोड़ रुपए के प्रोजेक्ट के तहत स्टेट हाईवे नंबर 34 और 35 को फोर लेन में परिवर्तित करेगा। चालू वर्ष में पावर सैक्टर में कंपनी ने महाराष्‍ट्र स्टेट इलेक्ट्रिसिटी डिस्ट्रीब्यूशन कॉरपोरेशन से 375 करोड़ रुपए का पावर डिस्ट्रीब्यूशन ईपीसी कॉन्ट्रेक्ट हासिल किया है। इसके अलावा कंपनी के पास एमएमआरडीए के लिए लॉ कोस्ट हाउसिंग, पवई में एक आईटी पार्क, पंजाब के कपूरथला ज्यूडिशियल कोर्ट कोम्प्लेक्स जैसे प्रोजेक्ट भी हैं। सुप्रीम इंफ्रास्ट्रक्चर इंडिया लिमिटेड की सब्सिडियरी सुप्रीम हाउसिंग एंड होस्पिटेलिटी लिमिटेड पवई में 116 करोड़ रुपए की लागत से 25 लाख वर्ग फीट क्षेत्रफल में सुप्रीम सिटी का निर्माण कर रही है। यहां व्यवसायिक स्थान, फाइव स्टार होटल, विला और अपार्टमेंट होंगे। पहले चरण में यहां आईटी और बिजनेस पार्क बनकर तैयार हो चुका है और कई मल्टी नेशनल कंपनियों ने अपना काम भी यहां से शुरू कर दिया है। शर्मा बंधुओं को पूरा विश्वास है कि पैसे के बढ़ने से वे अपने सभी प्रोजेक्ट समय पर पूरे कर लेंगे।