Saturday, August 27, 2011

ईआईएच : निवेशकों की पौ-बारह संभव

ओबेराय होटल की मालिक कंपनी ईआईएच के शेयर में एक बार फिर जोरदार हलचल शुरु हो गई है। यह हलचल सेबी द्धारा टेकओवर कोड में परिवर्तन किए जाने के तत्‍काल बाद आईटीसी अध्‍यक्ष वाई सी देवेश्वर के बयान के बाद आई। वाई सी देवेश्वर ने साफ कहा है कि हम ईआईएच में निवेश बढ़ाने के बारे में सोच रहे हैं।

आईटीसी के चेयरमैन वाई सी देवेश्वर का कहना है कि ईआईएच में और निवेश पर हमारा ट्रेजरी विभाग फैसला करेगा लेकिन मौजूदा भाव पर हिस्‍सेदारी बढ़ाने का यह अच्‍छा मौका है, हम निवेश करेंगे। आईटीसी के पास चार हजार से पांच हजार करोड़ नकदी है। जब हम इसे निवेश करेंगे तो इक्विटी में ही होगा और कारोबार की बात की जाए तो आप जानते ही हैं कि यह होटल्‍स में होगा। सेबी ने नए टेकओवर कोड में कहा किसी कंपनी में निवेश 15 फीसदी से बढ़ाकर 25 फीसदी किया जा सकता है और इसके बाद ओपन ऑफर लाना होगा। आईटीसी के पास ईआईएच की 14.98 फीसदी इक्विटी है।

आईटीसी के पास ईआईएच के शेयर वर्ष 2000 से हैं और यह अटकल हमेशा रही है कि आईटीसी ईआईएच के शेयरधारकों के लिए ओपन ऑफर लाएगी लेकिन कंपनी ने अनेक बार इससे इनकार किया है। ईआईएच में रिलायंस इंडस्‍ट्रीज के अध्‍यक्ष मुकेश अंबानी को भी रुचि है और उन्‍होंने इसके 14.8 फीसदी शेयर ले रखे हैं। जबकि, प्रमोटरों के पास 34.4 फीसदी शेयर हैं।

ईआईएच के तीन प्रमोटरों ने पिछले साल मुकेश अंबानी की कंपनी रिलायंस इंडस्ट्रीज की पूर्ण स्‍वामित्‍ववाली सब्सिडियरी रिलायंस इंडस्‍ट्रीज इनवेस्‍टमेंट एंड होल्डिंग्‍स प्रा. लि. को 5.54 करोड़ शेयर बेचे थे जो कुल इक्विटी का 14.12 फीसदी हिस्‍सा थी। इक्विटी बेचने वाले ये तीन प्रमोटर ओबेराय होटल्‍स प्रा. लि., अरावली पॉलिमर्स प्रा. लि. और पृथ्‍वी राज सिंह ओबेराय हैं। मुकेश अंबानी की कंपनी ने 14.12 फीसदी इक्विटी के लिए एक हजार करोड़ रुपए से ज्‍यादा चुकाएं। बाद में आए राइट इश्‍यू से रिलायंस सब्सिडियरी का हिस्‍सा बढ़कर 14.8 फीसदी पहुंच गया।

हालांकि, सेबी के नए टेकओवर कोड के बाद रिलायंस ने ईआईएच में अपनी हिस्‍सेदारी बढ़ाने के संबंध में कोई संकेत नहीं दिया है। लेकिन आईटीसी तैयारी कर रही है। आईटीसी पहले से ही होटल कारोबार में हैं लेकिन रिलायंस ने अब तक यह नहीं कहा है कि वह इस नए कारोबार में उतरेगी या यह केवल एक निवेश है।

आईटीसी के पास होटल लीला वेंचर के भी 13 फीसदी शेयर हैं। होटल लीला के प्रमोटरों के पास शेयरधारिता 54.6 फीसदी है इसलिए होटल लीला के अधिग्रहण का डर कम है। होटल लीला के प्रमोटर अपना 2800 करोड़ रुपए का कर्ज बोझ कम करने के लिए कुछ हिस्‍सा निजी इक्विटी खिलाडियों को बेचने पर विचार कर रहे हैं। लेकिन पिछले दिनों होटल लीला के शेयर प्रमोटरों की ओर से बाजार से खरीदे गए हैं।

टेकओवर कोड का अन्‍य लाभ वायसराय होटल्‍स को होगा। शेयर निवेशक राकेश झुनझुनवाला के पास इसके 11.5 फीसदी शेयर हैं, जबकि प्रमोटरों के पास 32.2 फीसदी शेयर हैं। वायसराय के 5.9 फीसदी शेयर अनिल अंबानी समूह की कंपनी सोनाटा इनवेस्‍टमेंट के पास है।जो निवेशक धैर्यवान हैं और लंबे समय में बेहतर रिटर्न चाहते हैं उनके लिए ईआईएच बेहतर शेयर हो सकता है। ईआईएच के टेकओवर के लिए आईटीसी के इरादों का जवाब देने के लिए मुकेश अंबानी मैदान में उतरते हैं तो निवेशकों की पौ-बारह होने की संभावना है।

Tuesday, May 10, 2011

एक तरबूज और एक जान

क्रांतिकारी राज्य के नाम पर मार्क्‍सवादी और तृणमूल पार्टी के लोग पश्चिम बंगाल पर खूब गर्व करते हैं। हमारा बंगाल....हमारा कोलकाता....लेकिन इतनी दरिंदगी भी पश्चिम बंगाल में है यह सोचा नहीं जा सकता। महज एक तरबूज जिसकी कीमत दस रुपए से ज्‍यादा नहीं होगी के लिए एक नौ साल की लड़की की पश्चिम बंगाल के मालदा के भबानीपुर गावं में हत्‍या कर दी गई।

इस नन्‍ही जान कुलसुम का दोष यह था कि उसने फ्रूट मंडी में एक तरबूत चुरा लिया था। लेकिन उसे चोरी बुरी बात है...समझाने के बजाय इतना बड़ा दंड दिया कि उसका जीवन ही छिन लिया। तीन स्‍थानीय कारोबारियों और एक ट्रक डाइवर ने इस लड़की को बिजली के खंभे के साथ बांधकर तब तक पीटा, जब तक कुलसुम मर नहीं गई। हैरत की बात यह है कि लोग तमाशाबीन की तरह इस कांड को देखते रहे और हत्‍यारों से ना तो इस लड़की को बचा पाए और ना ही इन चारों को ठोक पाए। भीड़ चाहती तो इन चारों की चटनी बना सकती थी लेकिन समझ नहीं आता कि आदमी की संवेदनशीलता कहां चली गई, मानवीयता कहां चली गई। हाथ ही नहीं उठे और बातें होती है कि पश्चिम बंगाल क्रांतिकारी राज्‍य है।

एक नादान लड़की की हत्‍या करने वाले क्रांतिकारी नहीं, नपुंसक है। राज्‍य में विधानसभा चुनाव चल रहे हैं, खासा बंदोबस्‍त है लेकिन पुलिस सो रही है। राजनेता सो रहे हैं। बुद्धदेव को फिर कुर्सी पर आना है और ममता को कुर्सी लपकनी है। कुलसुम के मां-बाप बिलख रहे हैं, दो जने पकड़े गए है लेकिन भ्रष्‍ट पुलिस इन पैसे वाले कारोबारियों से पैसे लेकर सब रफा दफा कर देगी, यह तय है। पुलिस पर तो किसी को भरोसा ही नहीं है, पुलिस पर से क्‍यों भरोसा उठ गया है, यह चिंतन का विषय है। एसपी भूषण चंद्र मंडल के व्‍यवहार से यही लगता है कि मामला सेट हो गया है और एक नादान मौत पर पैसे की जीत होकर रहेगी। जनता को खुद जागना चाहिए और ऐसे दरिंदों को खुद सजा देनी चाहिए।

Thursday, May 05, 2011

बाबा रामदेव पहले अपने घर की करें सफाई

लो आखिरकार बाबा रामदेव ने भी लोकप्रियता को और बढ़ाने एवं जनपथ-राजपथ पर बैठे नेताओं से निकटता बढ़ाने के लिए भूख हड़ताल का सहारा लेने का फैसला कर ही लिया। अन्‍ना हजारे के बताए रास्‍ते पर चलकर वे भी लोगों के दिलों पर राज करने या दिल्‍ली में बैठी सरकार के साथ एसी वाले कमरों में जगह चाहते हैं।

लेकिन बाबा को हड़ताल पर बैठने से पहले अपनी सारी संपत्ति और दान का हिसाब जनता को देना चाहिए क्‍योंकि अधिकतर हिंदुस्‍तानी यह मानते हैं कि उनकी सम्पत्ति काला धन तो नहीं है ? क्‍योंकि भाई एक दशक पहले बाबा रामदेव साइकिल पर चलते थे। साइकिल यदि पंक्चर हो जाती थी, तो उसे सुधरवाने के लिए उन्हें पैसे जुटाने के लिए मशक्कत करनी पड़ती थी। लेकिन आज बाबा हेलीकॉप्टर में सफर करते हैं। यह पैसा कहां से आया, जरा हमें भी बताइए ताकि बसों और ट्रेनों से उठकर हम भी हेलीकॉप्‍टर में पहुंच जाएं। पिछले 12 साल में बाबा ने जो धन इकठ्ठा किया है, उसका उन्हें हिसाब देना चाहिए।

अगर बाबा रामदेव की संपत्ति पर नजर डालें तो पतंजलि योगपीठ की कीमत 1000 करोड़ रुपए है। वहीं स्कॉटलैंड में रिट्रीट लैंड करीब 15 करोड़ रुपए की और साथ ही एक धार्मिक टीवी चैनल में बाबा के ट्रस्ट की हिस्सेदारी है। हालांकि, बाबा इस टीवी चैनल में अपनी हिस्‍सेदारी पर गलत बता रहे हैं और हिस्‍सा बेचने वाले कह रहे हैं कि बाबा ने हमें हिस्‍सा खरीदने के पैसे दिए। इसके अलावा दिव्य योग मंदिर, दिव्य योग आश्रम, कृपालु बाग, दिव्य फॉर्मेसी, पतंजलि हर्बल, पतंजलि योग विश्वविद्यालय, हर्बल वाटिका व आयुर्वेदिक चिकित्सा और अनुसंधान संस्थान पर बाबा का अधिकार है। रामदेव को आश्रम की दवाईयों की बिक्री से 25 करोड़ की आय होती है। योग किताबों और सीडी से उन्हें 10 करोड़ की आया अनुमानित है। वहीं उनके स्पेशल कैंप में शामिल होने की कीमत पांच हजार रूपए साप्ताहिक है। इस कैंप में सालाना 50 हजार लोग आते हैं।

बाबा पहले कह चुके हैं कि उनका किसी बैंक में खाता नहीं है। बैंक में खाता होने का मतलब यह नहीं है कि जिनका खाता है वे ही अरबपति हैं। आपके पास किसी भी रुप में पैसा हो, वही मालदार है। रामदेव बाबा को कुछ समय पहले नागपुर में एक मीडिया हाउस ने अपने अखबार के लोकार्पण के लिए बुलाया था। उस समय बाबा ने 20 लाख रुपए नकद में उनके पंतजलि योगपीठ को देने एवं उनके आने जाने के लिए चार्टर्ड विमान और काजू, बादाम सहित रईस खाने की मांग की थी। 20 लाख रुपए और चार्टर्ड विमान के भाड़े को जोड़ने के बाद उस मीडिया हाउस ने उन्‍हें नागपुर नहीं बुलाया। ऐसी ही मांगें ढ़ेर जगह से सुनी जाती है। भरोसा न हो तो खुद ही उनसे किसी कार्यक्रम में शरीक होने के लिए कहिए वे अपनी फीस बता देंगे। जिस मंच पर बैठेंगे वहां से चाहते हैं कि केवल उनको ही तगड़ा कवरेज किया जाए। बाबा बन गए लेकिन लालसा नहीं गई, प्रचार की लालसा, पैसे की लालसा। झूठ बोल रहे हैं बाबा, जब धन नकद में ले लिया तो बैंक खाते की जरुरत ही क्‍या है। बाबा रामदेव की सारी संपदा की जांच होनी चाहिए और ट्रस्‍ट के लिए सरकारी अधिकारी को कर्ता के रुप में नियुक्‍त किया जाना चाहिए। बाबा जी पहले अपने घर में सफाई कीजिए इसके बाद भूख हड़ताल पर उतरिए, जनता आपका साथ देगी अन्‍यथा ढोंगबाजी बंद कीजिए और रूपया बटोरकर अपने स्कॉटलैंड के रिट्रीट लैंड में ऐश करिए।

Monday, April 04, 2011

बेईमान रावण, बेईमान संगकारा

भारतीय संस्‍कृति के महापुरुष एवं भगवान राम की पत्‍नी सीता को लंका का राजा रावण जिस तरह छल, छिद्र और धोखे से उठा लंका ले गया था वही कर्मकांड श्रीलंका क्रिकेट टीम के कप्‍तान कुमार संगकारा करने वाले थे। रावण ने सीता के सामने झूठ बोलकर उसे लक्ष्‍मण रेखा से बाहर आने भीक्षा देने और कोई चिंता न करने का आश्‍वासन दिया। सीधी सादी सीता ने लक्ष्‍मण रेखा को पार किया और रावण उसे पुष्‍पक विमान में जबरन बैठाकर लंका ले भागा।

अब इस कथा को कलियुग में दोहराते हुए देखिए। श्रीलंका जिसका नक्‍शा भारत का नक्‍शा खरीदने पर फ्री मिलता है, के क्रिकेट कप्‍तान कुमार संगकारा के मन में विश्व कप फाइनल के लिए टॉस होने पर बेईमानी आ गई। विश्व कप ट्राफी को सीता की तरह संगकारा पुष्‍पक विमान की जगह श्रीलंका एयरलाइन से कोलम्‍बो ले जाना चाहते थे। संगकारा को भरोसा था कि इस मैच का जो टॉस जीतेगा वह विश्व कप विजेता जरुर बनेगा। फाइनल मैच के लिए जब टॉस हुआ और भारत ने टॉस जीता तो कुमार संगकारा ने मुहल्‍ले में खेलने वाले बच्‍चों की तरह कहा कि उन्‍होंने हैड या टेल कुछ बोला ही नहीं था तो भारत के टॉस जीतने की बात ही कहा हो गई।

संगकारा और धोनी के बीच बातचीत के बाद मैच रेफरी ज्यौफ क्रो ने दोबारा टॉस करने का फैसला किया। श्रीलंका के कप्तान ने हालांकि दूसरे मौके पर टॉस जीता लेकिन बेईमानी पर कप जीतने के मसूबे धरे रह गए। संभवत: राम ने ही लंका के रावण संगकारा के इस दूसरे झूठ व धोखे को भांप लिया और जीत गई भारतीय टीम। भारतीय बल्‍लेबाजी में धोनी ने इस रावण के झूठ की धज्जियां उड़ा दी। इसलिए ही कहा जाता है सत्‍यमेव जयते।

Tuesday, March 29, 2011

दानवीर कर्ण और वारेन बफेट एंड बिल गेटस

दो अमरीकी महाधनाढ़य वारेन बफेट और बिल गेटस भारतीयों को दान की महिमा एवं दान करने के लिए प्रेरित करने पधारे। असल में तो सारा खेल इस दान महिमा के पीछे उनके बिजनैस का ही रहता है। वारेन बफेट को सुनने के लिए साफ कहा गया था कि पहले एक बीमा पॉलिसी खरीदो तो ही उनके कार्यक्रम में आ सकते हैं। दूसरा, बिल गेटस को आम आदमी जानता ही है कि दुनिया भर में जो कंप्‍यूटर चल रहे हैं वे अब उन्‍हें घर बैठे बिठाए खूब कमाई दे रहे हैं। कल की कोई चिंता नहीं है।

वारेन बफेट भारतीयों को दान के लिए प्रेरित करते हुए भारत सरकार को भी इस बात के लिए प्रेरित कर रहे हैं कि बीमा क्षेत्र में सीधे विदेशी धन की सीमा 26 फीसदी को खत्‍म कर सौ फीसदी कर दी जाए ताकि उनकी दुकान यहां अच्‍छी तरह जम सके। बिल गेटस के बारे में आम आदमी जानता ही है कि जो कंप्‍यूटर चल रहे हैं वे दिन रात उनकी तिजोरियां भर रहे हैं। भारतीय उद्योगपति इस समय सम्‍पत्ति सर्जन कर रहे हैं जबकि बफेट एवं गेटस यह काम कर चुके हैं। हालांकि, भारतीयों को दान की महिमा के बारे में बताने की जरुरत नहीं है। भारतीय उद्योगपति कारोबार के अलावा दान पुण्‍य का कार्य ढोल नगाड़ा बजाए बगैर कर रहे हैं।

दानवीर कर्ण से लेकर म‍हर्षि दधीचि इस देश में जन्‍मे हैं। इस देश में अनेक राजा-महाराजा, रईस पैदा हुए हैं जिन्‍होंने परोपकार के लिए अपना सब कुछ लूटा दिया। आज भी देश में अनेक ऐसे लोग हैं जो यह कार्य कर रहे हैं लेकिन वे इसका ढोल नहीं पीट रहे। दान के बारे में कहा गया है कि दान वही उत्तम होता है जो सही पात्र को दिया जाए और दाएं हाथ से दान दिया जाए तो बाएं हाथ तक को पता न चले। बाएं हाथ से दान दिया जाएं तो दाएं हाथ तक को पता न चले। लेकिन अंतरराष्‍ट्रीय धनाढ़य भारतीय संस्‍कृति और आदर्श नहीं जानते। वे यह समझते हैं कि एक फाउंडेशन बनाओं और दान का ढोल इतना जोर से पीटो कि लगे तीनों लोक में इनसे बड़ा दानी पैदा नहीं हुआ। अब जानिए आप दानवीर कर्ण की कथा:

महाभारत का युद्ध चल रहा था। सूर्यास्त के बाद सभी अपने-अपने शिविरों में थे। उस दिन अर्जुन ने कर्ण को पराजित कर दिया था। इसलिए वह अहंकार में चूर थे। वह अपनी वीरता की डींगें हांकते हुए कर्ण का तिरस्कार करने लगे। यह देखकर श्रीकृष्ण बोले-“पार्थ! कर्ण सूर्यपुत्र है। उसके कवच और कुंडल दान में प्राप्त करने के बाद ही तुम उस पर विजय पा सके हो अन्यथा उसे पराजित करना किसी के वश में नहीं था। वीर होने के साथ ही वह दानवीर भी हैं। उसके समान दानवीर आज तक नहीं हुआ।”

कर्ण की दानवीरता की बात सुनकर अर्जुन तिलमिला उठे और तर्क देकर उसकी उपेक्षा करने लगा। श्रीकृष्ण अर्जुन की मनोदशा समझ गए थे। वे शांत स्वर में बोले-“पार्थ! कर्ण रणक्षेत्र में घायल पड़ा है। तुम चाहो तो उसकी दानवीरता की परीक्षा ले सकते हो।” अर्जुन ने श्रीकृष्ण की बात मान ली। दोनों ब्राह्मण के रूप में उसके पास पहुंचे। घायल होने के बाद भी कर्ण ने ब्राह्मणों को प्रणाम किया और वहां आने का उद्देश्य पूछा। श्रीकृष्ण बोले-“राजन! आपकी जय हो। हम यहां भिक्षा लेने आए हैं। कृपया हमारी इच्छा पूर्ण करें।”

कर्ण थोड़ा लज्जित होकर बोला-“ब्राह्मण देव! मैं रणक्षेत्र में घायल पड़ा हूं। मेरे सभी सैनिक मारे जा चुके हैं। मृत्यु मेरी प्रतीक्षा कर रही है। इस अवस्था में भला मैं आपको क्या दे सकता हूं?” “राजन! इसका अर्थ यह हुआ कि हम खाली हाथ ही लौट जाएं? ठीक है राजन! यदि आप यही चाहते हैं तो हम लौट जाते हैं। किंतु इससे आपकी कीर्ति धूमिल हो जाएगी। संसार आपको धर्मविहीन राजा के रूप में याद रखेगा।” यह कहते हुए वे लौटने लगे। तभी कर्ण बोला-“ठहरिए ब्राह्मणदेव! मुझे यश-कीर्ति की इच्छा नहीं है, लेकिन मैं अपने धर्म से विमुख होकर मरना नहीं चाहता। इसलिए मैं आपकी इच्छा अवश्य पूर्ण करूंगा।

कर्ण के दो दांत सोने के थे। उन्होंने निकट पड़े पत्थर से उन्हें तोड़ा और बोले-“ब्राह्मण देव! मैंने सर्वदा स्वर्ण(सोने) का ही दान किया है। इसलिए आप इन स्वर्णयुक्त दांतों को स्वीकार करें।” श्रीकृष्ण दान अस्वीकार करते हुए बोले-“राजन! इन दांतों पर रक्त लगा है और आपने इन्हें मुख से निकाला है। इसलिए यह स्वर्ण जूठा है। हम जूठा स्वर्ण स्वीकार नहीं करेंगे।” तब कर्ण घिसटते हुए अपने धनुष तक गए और उस पर बाण चढ़ाकर गंगा का स्मरण किया। तत्पश्चात बाण भूमि पर मारा। भूमि पर बाण लगते ही वहां से गंगा की तेज जल धारा बह निकली। कर्ण ने उसमें दांतों को धोया और उन्हें देते हुए कहा-“ब्राह्मणों! अब यह स्वर्ण शुद्ध है। कृपया इसे ग्रहण करें।

तभी कर्ण पर पुष्पों की वर्षा होने लगी। भगवान श्रीकृष्ण और अर्जुन अपने वास्तविक स्वरूप में प्रकट हो गए। विस्मित कर्ण भगवान श्रीकृष्ण की स्तुति करते हुए बोला-“भगवन! आपके दर्शन पाकर मैं धन्य हो गया। मेरे सभी पाप नष्ट हो गए प्रभु! आप भक्तों का कल्याण करने वाले हैं। मुझ पर भी कृपा करें।” तब श्रीकृष्ण उसे आशीर्वाद देते हुए बोले-“कर्ण! जब तक यह सूर्य, चन्द्र, तारे और पृथ्वी रहेंगे, तुम्हारी दानवीरता का गुणगान तीनों लोकों में किया जाएगा। संसार में तुम्हारे समान महान दानवीर न तो हुआ है और न कभी होगा। तुम्हारी यह बाण गंगा युगों-युगों तक तुम्हारे गुणगान करती रहेगी। अब तुम मोक्ष प्राप्त करोगे।” कर्ण की दानवीरता और धर्मपरायणता देखकर अर्जुन भी उसके समक्ष नतमस्तक हो गया। क्‍या वारेन बफेट और बिल गेटस दानवीर कर्ण से तो बड़े नहीं ही है क्‍योंकि वे जहां दान देते हैं वहां अपने कारोबारी लाभों को जरुर देखते हैं, जबकि कर्ण ने कोई लालसा नहीं रखी थी। यदि वह चाहता तो कृष्‍ण से जीवन मांग सकता था। आम भारतीय घरानों में बुजूर्ग दान और सहायता की जो शिक्षा देते हैं वह अमरीकी धनाढ़यों की शिक्षा से बेहतर होती है।