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February 28, 2007

मीठा जहर !

एक कहावत है जब किसी को गुड़ खिलाकर मारा जा सकता है तो जहर क्‍यों। चीनी उद्योग और चीनी शेयरों में इस समय यही हो रहा है। आम बजट में जहां मार खा रहे चीनी उद्योग की कोई चर्चा तक नहीं है, वहीं चीनी कंपनियों के शेयरों में निवेश करने वाले अब जमकर रो रहे हैं। केंद्र सरकार ने गन्‍ने के नए पेराई सत्र से पहले कहा था कि इस साल देश में चीनी का उत्‍पादन 230 लाख टन के करीब होगा, लेकिन अब जो सरकार ने आंकडें दिए हैं वे बताते हैं कि यह उत्‍पादन 260 लाख टन से ज्‍यादा है। जब उत्‍पादन से संबंधी सही आंकडें सरकार के पास ही नहीं है तो उद्योग या निवेशक किसका सहारा ले। चीनी निर्यात अब खुल जरुर गया है लेकिन इसका फायदा किसे, है कोई जो यह बता सके। अंतरराष्‍ट्रीय बाजार में जब चीनी में तेजी थी तो हमने निर्यात रोक दिया और जब जमकर मंदी आ गई तो कहा.....चलो बेटों निर्यात कर पैसा कमाओं, यहां तो तुम्‍हें धैला भी नहीं मिलने वाला।

राजनीतिक गलियारों की चर्चा पर भरोसा करें तो चीनी उद्योग का तब तक कोई भला नहीं होगा जब तक केंद्र में कृषि मंत्री शरद पवार रहेंगे। कांग्रेस इस समय शरद पवार से ऊब चुकी है और पश्चिम महाराष्‍ट्र में अपनी जमीन तलाश रही है। शरद पवार की जमीन खिसकाने के लिए महंगाई के नाम का सहारा लेकर चीनी उद्योग का कोई भला नहीं किया जाएगा। कांग्रेस पश्चिम महाराष्‍ट्र में अपनी जमीन तैयार कर अगला आम चुनाव अपने बलबूते लड़ना चाहती है ताकि पवार से पीछा छुड़ाया जा सके। खैर! यह तो बात हुई राजनीतिक गलियारों की। चीनी कंपनियों पर पड़ी मार उनके शेयरों पर भी पड़ी है। एक समय शेयर बाजार के फैंसी बन चुके चीनी स्‍टॉक से अब निवेशक दूर भाग रहे हैं और जिनके पास ये हैं वे रो रहे हैं। हालांकि, अनेक सलाहकार अब भी कहते दिख जाएंगे कि चीनी शेयर अमुक लेवल पर खरीदो और निकल जाओ। लेकिन निकलता कौन है......केवल सलाह देने वाला, न कि सलाह लेने वाला। मौजूदा माहौल का विश्‍लेषण करें तो चीनी स्‍टॉक अगले दो साल तक वैसी गर्माहट नहीं दिखा सकते जो वे पहले दिखा चुके हैं। सलाहकार कह रहे हैं चीनी में है दम....बात सच है जब छोटे निवेशकों को मीठा खिला खिलाकर मारा जा सकता है तो जहर क्‍यों दें।

2 comments:

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