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January 18, 2008

यही होता है लालच का अंजाम !

बॉम्‍बे स्‍टॉक एक्‍सचेंज में आज जिस तरह फ्री फ्लो गिरावट आ रही थी उसने यह तो साफ कर दिया कि अंतरराष्‍ट्रीय बाजार से मिल रहे मंदी के संकेत के बावजूद तेजी का खेल खेलना कितना खतरनाक हो सकता है। वाह मनी ने 11 जनवरी 2008 को अपनी पोस्‍ट डर पर हावी लालच में काफी कुछ चेता दिया था। इसके अलावा 24 दिसंबर 2007 को अपनी पोस्‍ट शेयर बाजार में अगले साल तगड़ी चंचलता..में भी यह बताया था कि निवेशक मुनाफावसूली करते रहें और हर बड़ी गिरावट पर छोटी छोटी मात्रा में बेहतर स्‍टॉक की खरीद। मुनाफावसूली और बिकवाली में अंतर होता है। हर ऊपरी स्‍तर पर बिकवाली कर निचले स्‍तर पर खरीद करना ही फायदे का सौदा होता है।

वाह मनी शेयर बाजार में मंदी की बात नहीं कर रहा है लेकिन अमरीका में सबप्राइम के जो नतीजे सामने आ रहे हैं उससे यह तो साफ हैं कि अंतरराष्‍ट्रीय बाजार में घटने वाली हर घटना का हमारे शेयर बाजार पर असर जरुर पड़ेगा। हम अपनी इस राय पर पहले की तरह कायम है कि दिवाली 2008 तक बीएसई का सेंसेक्‍स 25 हजार अंक की ऊंचाई को छू लेगा। आप इसे इस तरह भी ले सकते हैं कि जब हम एक ट्रेन से यात्रा करते हैं तो जरुरी नहीं कि वह जगह एक ही स्‍पीड में दौड़े। ट्रेन कई बार तेज गति से दौड़ती है तो कई बार उसकी गति धी‍मी पड़ जाती है और कई दफा किसी जगह खड़ी रह जाती है, फिर दौड़ने लगती है। यही हालत शेयर बाजार की है। अधिकतर निवेशक गिरावट को नजरअंदाज कर सिर्फ तेजी पर सवार थे और डर पर लालच हावी हो चुका था जिसने अब तक शेयर बाजार को काफी कुछ धो दिया।

भारतीय शेयर बाजार में तेजी का यह आठवां साल है और इस साल अंतरराष्‍ट्रीय बाजारों में घटने वाली घटनाओं का हमारे बाजार पर खासा असर पड़ेगा। हालांकि, जो निवेशक मध्‍यम से लंबी अवधि के लिए यहां पैसा लगा रहे हैं उन्‍हें चिंतित होने की जरुरत नहीं है। सबसे बड़ी चिंता फ्यूचर एंड ऑप्‍शन यानी एफएंडओ खेलने वालों के लिए है। वाह मनी ने हमेशा अपने पाठकों को यही राय दी है कि वे एफएंडओ से बचें। अपनी मेहनत की कमाई को इस तरह के खेल में न गवांकर डिलीवरी आधारित कामकाज करना चाहिए। अन्‍यथा छोटा कांट्रैक्‍ट, बड़ा सेन्‍स...आपके पोर्टफोलियो को छोटा, छोटा और छोटा करता जाएगा एवं आपको तब पता चलेगा कि सेन्‍स से न किए गए कार्य का अंजाम क्‍या होता है।

भारतीय शेयर बाजार में आई ताजा गिरावट अभी नहीं थमेगी....हो सकता है कि किसी दिन आपको दो सौ, चार सौ अंक का सुधार दिखाई दे जाए लेकिन इसके बाद फिर गिरावट आएगी। आम बजट तक 17 से 18 हजार अंक के आसपास दिख सकता है। सेंसेक्‍स में बड़ी बढ़त तभी दिखाई देगी जब यह 21 हजार अंक के ऊपर उठेगा। हालांकि, इस बीच अमरीका ब्‍याज दरों में और कटौती कर कुछ समय के लिए बाजार को ऊपर उठा सकता है लेकिन यह मंदी नामक बीमारी का स्‍थाई इलाज नहीं है। हमें भी ज्‍यादा खुश होने की जरुरत नहीं है क्‍योंकि हमारी अर्थव्‍यवस्‍था बुनियादी तौर पर ठीक है लेकिन उच्‍च ब्‍याज दरों और ऊंचे डेप्रिसिएशन का दबाव कंपनियों पर बढ़ रहा है जिसके नतीजे हमें वर्ष 2008/09 की दूसरी छमाही में भोगने पड़ सकते हैं। हम निवेशकों से एक बार फिर कहना चाहेंगे कि वे एफएंडओ से दूर रहते हुए हर बढ़त पर मुनाफावसूली और बड़ी गिरावट पर खरीद करते रहें।

9 comments:

आशीष महर्षि said...

आपने तो शेयर बाजार को रेल गाड़ी बना दिया, खैर मुनाफावसूली जिंदाबाद

Anonymous said...

kamalji
bazar to unke liye hai jinke pass paisa hai.Unke liye ye post kam ki hai. hum jaise kadkon ke liye kya rakha hai bazar main.

गरिमा said...

आज के गिरावट के बारे मे अन्दाजा कल शाम ही हो गया था, कैसे, सिम्प्ल दलाल स्ट्रीट जिन्दाबाद ::D, इसलिये पोर्ट्फोलिओ कुछ हद तक हल्का कर लिया था :) पर अब ये नही पता सोमवार को क्या होगा... सो देखा जायेगा :P

संजय बेंगाणी said...

अपन तो लम्बे काल के इंवेस्ट में विश्वास करते है. तो थोड़ा गिरने ही देते है, कुछ ले लेंगे.

Jitendra Chaudhary said...

कभी ना कभी तो ये होना ही था। आशंका तो पहले भी थे। इंफ़ोसिस, टीसीएस और रिलायंस के अच्छे नतीजे भी बाजार को गिरने से नही रोक सके। गिरने दो, ये सब एफ़आईआई का खेल है, उनकी खरीद पूरी होते ही, बाजार वापस आएंगे।

हमरी भी सुन लो, हम अपना पोर्टफोलिए (प्रोफ़िट वाले शेयर्स) तो पहले ही हल्के कर चुके है, नयी खरीदारी भी स्क्रिप्ट टू स्क्रिप्ट बेसिस पर जारी है। अभी तेजी फिर लौटेगी, टेंशन नही लेने का , लेकिन उस समय भी दिमाग की माने, दिल को काबू मे रखकर,अच्छे फ़ंडामेंटल्स वाले शेयरों मे निवेश करें, शार्ट टर्म वाले ट्रेडर्स सावधान रहें, लांग टर्म वाले निश्चिंत रहें।

अविनाश वाचस्पति said...

यदि मेरी स्मृति दुरुस्त है तो रिलायंस इंडस्टरीज के नतीजे आने पर पिछले वर्ष भी इसके दाम गिरे थे।

शेयर बाजार है ऐसी रेल, गिराने उठाने का खेले खेल।
जब हो तेज चढ़ जा प्यारे, धीमी होने पर उतरना जान।।
कहना कमल का अवश्य मान, अमल कर ले shriमान।।।

रेल से शेयर बाजार की तुलना ठीक की गई है। ऐसी रपटें जनहित में जारी रहनी चाहिएं।

अविनाश वाचस्पति said...

यदि मेरी स्मृति दुरुस्त है तो रिलायंस इंडस्टरीज के नतीजे आने पर पिछले वर्ष भी इसके दाम गिरे थे।

शेयर बाजार है ऐसी रेल, गिराने उठाने का खेले खेल।
जब हो तेज चढ़ जा प्यारे, धीमी होने पर उतरना जान।।
कहना कमल का अवश्य मान, अमल कर ले shriमान।।।

रेल से शेयर बाजार की तुलना ठीक की गई है। ऐसी रपटें जनहित में जारी रहनी चाहिएं।

rajivtaneja said...

शेयर बाज़ार की समझ अधिक समझ नहीं है लेकिन
अविनाश वाचस्पति जी की कविता बडी झकास है

हरिराम said...

किसी शेयर का बाजार मूल्य या अंकित मूल्य face value उस कम्पनी के शेयर के 'असली मूल्य' practical value को प्रकट नहीं करता। न ही NSE या BSE के वेबसाइट में ऐसा कोई विवरण मिलता है। उदाहरण के लिए किसी ABCD कम्पनी के 10 रु. वाले अंकित मूल्य के शेयर का बाजार भाव आज यदि 400 रु. है, किन्तु इस कम्पनी की अधिकृत पूँजी सिर्फ 600 करोड़ रु. की है, जबकि कच्चे तथा तैयार माल सहित इसकी कुल परिसम्पत्ति का वर्तमान बाजार मूल्य 60000 हजार करोड़ है, तो इसके एक शेयर का प्रैक्टिकल मूल्य 1000 रु. बैठेगा। यदि यह कम्पनी नीलाम हो या कबाड़ी के भाव बिके तो भी व्यक्ति को 1000 रुपये प्रति शेयर तो मिल जाएँगे।

दूसरी ओर किसी सॉफ्टवेयर कम्पनी यथा इन्फोसिस के रु.1 मात्र के अंकित मूल्य के शेयर का बाजार भाव आज यदि रु.5000/- है, किन्तु यदि यह कम्पनी डूब जाए, या नीलाम हो तो इसकी अधिकृत पूँजी तथा कुल परिसम्पत्ति के मूल्य का अनुपात आंका जाए तो रु.1 वाले प्रति शेयर का मूल्य लगभग सिर्फ 5 पैसे ही होगा। अर्थात् 50000 हजार गुणा हानि। क्योंकि सॉफ्टवेयर तो एक प्रकार की सेवा है, जो कम्पनी के डूबते ही बेकार हो जाती है। कोई वस्तु तो है नहीं जिसे कबाड़ी के भाव भी बेचा जा सके।

सेबी को चाहिए कि हर कम्पनी की प्रोफाइल में अनिवार्य रूप से उस कम्पनी के शेयर का प्रैक्टिकल मूल्य का आकलन कर दर्शाए। ताकि गरीब तथा आम उपभोक्ता देख समझ कर सही प्रैक्टिकल मूल्य वाले शेयर खरीदे।

शेयर बाजार का असली उद्देश्य बड़ी कम्पनियों में आम जनता की भागीदारी कराकर उन्हें लाभ का कुछ हिस्सा दिलाना था।

लेकिन दुर्भाग्य से आज सारा शेयर बाजार बड़ी भारी पूँजी वाले संस्थागत निवेशकों की कठपुतली है, जो लाखों करोड़ों, अरबों की पूँजी निवेश करके या बाजार से निकाल कर बाजार को उठा या गिरा सकते हैं।

संस्थागत निवेशकों के लिए सीमा होनी चाहिए कि वे किसी कम्पनी के 1 प्रतिशत से अधिक शेयर कदापि खरीद नहीं पाएँ। किसी एक संस्था को नहीं बेचे जाएँ। तभी शेयर बाजार प्रैक्टिकल आधार पर टिक सकता है।