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February 05, 2008

जिम रोजर्स ने छोड़ा ठंडे अमरीका को

वाह मनी के नियमित पाठक और मित्र अरबिंद सोलंकी का दूसरा लेख जो उन्‍होंने दुनिया के एक और बड़े निवेश गुरु जिम रोजर्स के बारे में भेजा। आप भी पढ़ें इस लेख को।

हॉट कमोडिटी के लेखक और जाने माने कमोडिटी व इक्विटी विशेषज्ञ जिम रोजर्स ने अपना मेनहटन (न्‍यूयार्क) का पसंदीदा घर बेच दिया है। यह मकान उन्‍होंने 30 साल पहले एक लाख डॉलर में खरीदा था और बेचा है तकरीबन 1.57 करोड़ डॉलर में। हालांकि, यह कोई खास खबर नहीं है, खास तो यह है कि वे अब सिंगापुर आ गए हैं और उन्‍हें अपने देश अमरीका पर भरोसा नहीं रहा। वे मानते हैं कि अमरीका को मंदी से कोई नहीं बचा सकता।

अब आप कहेंगे कि सिंगापुर में बसने में क्‍या बड़ी बात हुई तो बता दूं कि रोजर्स स्‍थान परिवर्तन अमरीकी अर्थव्‍यवस्‍था के घटते दबदबे और चीन के बाजार के प्रति बढ़ते विश्‍वास के कारण कर रहे हैं। मतलब रोजर्स को अमरीका दमहीन और चीन दमदार नजर आ रहा है। ऐसा नहीं कि रोजर्स ने यह फैसला अचानक लिया है। वे सालों से चीन को लेकर बुलिश हैं और काफी पहले एक्‍शन सेंटर यानी चीन के नजदीक रहने की बात कह चुके हैं। इस नजरिए से देखें तो रोजर्स का फैसला काफी रणनीतिक लगता है। वे चीन की यात्रा मोटरसाइकिल पर कर चुके हैं और चीन को उन्‍होंने निकट से देखा है। यानी फैसला काफी होमवर्क करने के बाद।

अमरीकी बाजार को लेकर रोजर्स कितनी मंदी में है यह इसी बात से समझा जा सकता है कि उन्‍होंने सिटी बैंक और न्‍यूयार्क के कई इनवेटमेंट बैंकों में अपनी शॉर्ट पोजीशन पिछले दिनों की जोरदार गिरावट के बावजूद कवर नहीं की है। फैडरल रिजर्व द्धारा ब्‍याज दर में 75 अंक और फिर 50 अंक की कटौती के बारे में रोजर्स का कहना है‍ कि यह इस बात का संकेत हैं कि सेंट्रल बैंक राजकोषीय अनुशासन बनाने की इच्‍छुक नहीं है जिसकी अर्थव्‍यवस्‍था को बेहद जरुरत है।

रोजर्स का कहना है कि अर्थव्‍यवस्‍था में मंदी है, डॉलर गिर रहा है और मुद्रास्‍फीति बढ़ रही है। लेकिन स्थिति इससे भी ज्‍यादा खराब है। बेन बर्नाक भारी मात्रा में नोटों की छपाई करवा रहे हैं, वे और फेडरल रिजर्व नियंत्रण से बाहर हैं। संभवत: हम दूसरे विश्‍व युद्ध के बाद की सबसे बड़ी मंदी की तरफ जा रहे हैं। बढ़ती मुद्रास्‍फीति के बीच फैड की लगातार लिक्विडिटी बढ़ाने की इच्‍छा से लगता है कि अमरीका 1970 के इतिहास को दोहराने वाला है। मतलब स्‍टैगफ्लेशन (मंदी और बढ़ती मुद्रास्‍फीति, दोनों एक साथ)? रोजर्स मानते हैं कि इसी की आशंका है और यही असली खतरा है।

वे मानते हैं कि अमरीका में मंदी का असर चीन पर भी पड़ेगा लेकिन सभी क्षेत्रों पर नहीं। इसलिए चीन में निवेश किया जा सकता है। रोजर्स चीन की अर्थव्‍यवस्‍था में करेक्‍शन की उम्‍मीद रखते हैं लेकिन यह भले के लिए होगा। वे चीन में निवेश करेंगे लेकिन उतावली के साथ नहीं, धीरे धीरे और चरणबद्ध ढंग से।

5 comments:

संजय बेंगाणी said...

जब जहाज डूब रहा होता है, चूहे सबसे पहले भाग खड़े होटल है...

आशीष महर्षि said...

सर नमस्‍कार। इस बात से तो इंकार नहीं किया जा सकता है कि सोलंकी जी का लेख वाकई काफी विश्‍वसनीय है। लेकिन एक बात जो दिमाग में खटक रही है वो यह है कि सोलंकी जी इतना अच्‍छा लेखन करते हैं। फिर अपने ब्‍लॉग को अपडेट करने में क्‍यों कंजूसी कर रहे हैं

गरिमा said...

जिम रोकर्स ने जो भी सोचा हो, लेकिन देश मे बदहाली हो तो भी मै अपना देश छोड़ने के पक्ष मे नही हो सकती...


वैसे मै अब सोच रही हूँ कि, Dow, Nadaq से संकेत लेकर ही अपना बाजार चलता है, तो इसका मतलब कि वो डूबेगा तो हम भी डूबेंगे... हमारे देश के लोग कहा जायेंगे??

Anonymous said...

garimaji
yeh desh se jaane ki baat nahin hai, nivesh ka mamala hai.kya jaan bojhkar aap kamjore aur girnewala stock Kharidengee.paisa kisi desh se bandha nahin hai, khaskar globlized economy, wo to wahan jayega jahan kamai ki gunjais hogi.

गरिमा said...

अपने देश मे रहकर भी चीन मे निवेश किया जा सकता था, हमारे देश मे विदेशी निवेश होता है, तो क्या वो सब हमारे देश मे रहने ही आये हैं, हाँ होना यह चाहिये कि हम फायदे वाले बाजार मे निवेश करें, पैसे बनाये और अपने देश की प्रगति मे योगदान दें, ना कि उसे छोड़ दे, जैस भी हो अपना देश अपना ही होता है...जैसे कि अगर मै गरीब घर मे पैदा हूई या मेरा घर गरीबी के संकट मे घिर आया हो तो क्या ऐसी स्थिती मे अपनो को छोड़कर जा सकती हूँ? क्या मेरा कर्तव्य नही बनता कि अपने घर के लिये कुछ करूँ? मेरी अपनी राय है, जरूरी नही कि सभी इससे सहमत ही हों।