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June 21, 2008

रियलटी शेयरों से दूर रहने में भलाई

build मुंबई। भारतीय शेयर बाजारों में इस समय रियलटी शेयरों की जमकर धुलाई हो रही है। इस क्षेत्र की कई कंपनियों के शेयर तो अपने इश्‍यू प्राइस से नीचे बिक रहे हैं, जिनमें देश की सबसे बड़ी रियलटी कंपनी डीएलएफ शामिल है।

डीएलएफ का आईपीओ प्राइस 525 रुपए था। इसी तरह शोभा डेवलपर्स का आईपीओ प्राइस 640 रुपए, पार्श्‍वनाथ डेवलपर्स का आईपीओ प्राइस 300 रुपए, ओमैक्‍स का आईपीओ प्राइस 310 रुपए और पूर्वांकरा प्रोजेक्‍ट्स का आईपीओ प्राइस 400 रुपए था लेकिन ये सभी इससे कम पर मिल रहे हैं।

रेलीगेयर सिक्‍युरिटीज के सुमन मेमानी का कहना है कि रियलटी बाजार पर निकट भविष्‍य में और दबाव पड़ने की आशंका है। आवासीय और व्‍यावसायिक दोनों सेगमेंट पर मांग तेजी से घटी है। साथ ही कच्‍चे माल की लागत में बढ़ोतरी से इन कंपनियों पर के मार्जिन पर दबाव पड़ रहा है। कई बिल्‍डरों और डेवलपरों ने धन की तंगी की वजह से अपनी अनेक परियोजनाओं पर काम रोक दिया है।

विशेषज्ञों का कहना है कि क्रूड के बढ़े दाम और महंगाई दर में हो रही लगातार बढ़ोतरी से भारतीय रिजर्व बैंक सीआरआर बढ़ा सकता है। ऐसा हुआ तो पहले से ही बुरे हाल हुए रियल इस्‍टेट की हालत और खराब हो जाएगी।

गौरतलब है कि भारतीय शेयर बाजार में वर्ष 1930 में बॉम्‍बे रिक्‍लेमेशन नामक रियलटी कंपनी सूचीबद्ध थी जिसका भाव उस समय छह हजार रुपए प्रति शेयर बोला जा रहा था, जबकि लोगों का वेतन उस समय दस रुपए महीना होता था। कंपनी का दावा था कि वह समुद्र में से जमीन निकालेगी और मुंबई को विशाल से विशाल शहर में बदल देगी लेकिन हुआ क्‍या? कंपनी दिवालिया हो गई और लोगों को लगी बड़ी चोट। अब यह लगता है कि अनेक रियालिटी या कंसट्रक्‍शंस के नाम पर कुछ कंपनियाँ फिर से इतिहास दोहरा सकती हैं।
आप खुद सोचिए कि ऐसा क्‍या हुआ कि रातोरात ये कंपनियां जो अपने आप को करोड़ों रुपए की स्‍वामी बता रही हैं, आम निवेशक को अपना मुनाफा बांटने आ गईं। प्रॉपर्टी में ऐसा क्‍या हुआ है कि भाव दिन दोगुने और रात चौगुने बढ़े हैं। क्‍या आम आदमी की खरीद शक्ति ब्‍याज दरों के काफी ऊंचा होने के बावजूद जोरदार ढंग से बढ़ रही है या फिर यह आर्टिफिशियल गेम है।

हालांकि, रियल इस्‍टेट क्षेत्र में मांग बुरी तरह घट जाने के बाद भी अभी तक कोई करेक्‍शन नहीं आया है। लेकिन जिस तरह से डेवलपर्स प्रॉपर्टी की खरीद के साथ मुफ्त वैकेशन पैकेज, फ्री मॉडयूलर किचिन, इंटीरियर, पार्किंग स्‍पेस देने की पेशकश कर रहे हैं उसे आगे कीमतों में करेक्‍शन का साफ संकेत मिलता है। मुफ्त पेशकश को ही देखें तो कुल मूल्‍य पर ग्राहकों को 7 से 15 फीसदी का डिस्‍काउंट मिल रहा है।

मुंबई जैसी कुछ जगहों पर तो डेवलपर्स नकद डिस्‍काउंट भी देने लगे हैं। मांग बढ़ाने के लिए डेवलपर्स आसान फाइनेंस की भी पेशकश कर रहे है जिससे ऊंची ब्‍याज दरों का असर कम हो सके। रियल इस्‍टेट क्षेत्र में कुछ सौदे रिकॉर्ड मूल्‍य पर भी हो रहे हैं लेकिन ये इस क्षेत्र की सच्‍चाई को बयान नहीं करते। यदि हम हाल की जमीन नीलामी, डेवलपर्स द्धारा किए जाने वाले प्रत्‍यक्ष या अप्रत्‍यक्ष डिस्‍काउंट, कैंसलेशन या रिसेल कीमतों को देखें तो साफ हो जाता है कि करेक्‍शन ज्‍यादा दूर नहीं है।
हाल में मुंबई और कुछ अन्‍य जगहों की भूमि नीलामी को देखें तो इनमें या तो खरीददार ही नहीं मिलें और खरीददार मिलें तो सौदे रिजर्व मूल्‍य से थोड़े से ज्‍यादा भाव पर ही हुए। एमएमआरडीए को तो दो प्‍लॉट के लिए कोई खरीददार नहीं मिला।

कीमतों में करेक्‍शन का एक और संकेत रिसेल फ्लैट के आंकडों से मिलता है। जिन प्रोजेक्‍ट्स पर काम चल रहा है उनमें रिसेल के भाव डेवलपर्स द्धारा ऑफर किए जाने वाले भावों से कम है। इसका बड़ा उदाहरण गुडगांव में देखने को मिल रहा है जहां कई प्रोजेक्‍ट में रिसेल भाव डेवलपर के ऑफर से 30 फीसदी तक कम हें। मुंबई में भी रहेजा एटलांटा में रिसेल कीमतें 30 फीसदी कम हैं। ऐसे में साफ है कि डेवलपर्स कृत्रिम रुप से कीमतों को ऊपरी स्‍तर पर थामने की कोशिश कर रहे हैं।

होम लोन डिमांड के आंकडें देखें तो वहां भारी कमी देखी गई है। कुछ समय पहले तक आईसीआईसीआई, एचडीएफसी जैसे अधिकतर बड़े लैंडर्स होम लोन मांग में 30 फीसदी तक बढ़त देख रहे थे लेकिन अब मांग में तेज गिरावट दर्ज की जा रही है। रियल इस्‍टेट की ऊंची कीमतें और ब्‍याज दरों में वृद्धि के कारण होम लोन की मांग पर असर पड़ रहा है। स्‍टैंप डयूटी और रजिस्‍ट्रेशन फीस कलेक्‍शन में भी पिछले साल के मुकाबले कमी आई है जो मांग में कमी को दर्शाता है। मांग में कमी के अलावा डेवपलर्स को इक्विटी और डेट बाजार दोनों से धन जुटाने में मुश्किल आ रही है जिससे कम कीमतों पर प्रॉपर्टी की बिक्री और नए निर्माण में धीमापन आ रहा है।

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