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March 18, 2011

सुप्रीम इंफ्रास्‍ट्रक्‍चर: बड़ी सोच का बड़ा नतीजा

यदि आज कार्पोरेट इंडिया के बड़े दिग्गज प्रेमजी, मित्तल और नारायण मूर्ति आदि कुछ दान करते हैं तो वह अखबारों और टीवी चैनलों की हैडलाइन बन जाती है। अब हम थोड़ा पीछे चलते हैं। जयपुर के 45 वर्षीय स्व. चन्द्रभान शर्मा, जो एक स्वतंत्रा सेनानी थे, ईस्ट इंडिया कंपनी से बचने के लिए जयपुर से पलायन कर मुंबई के पवई आ गए। सर मोहम्मद यूसुफ से उन्होंने अंधेरी से लेकर कांजुरमार्ग तक 4600 एकड़ जमीन खरीदी। 1947 में जब देश आजाद हुआ तब स्व. शर्मा चाहते थे कि आईआईटी की स्थापना मुंबई में हो, इसके लिए उन्होंने मात्र एक रुपए में अपनी 1700 एकड़ जमीन इस संस्थान की स्थापना के लिए दे दी। इतना ही नहीं 170 एकड़ जमीन उन्होंने एलएंडटी को 35000 रुपए प्रति माह किराए पर दी, जो 99 साल की लीज पर है (38 साल अभी बचे हैं)। यह एक इतिहास है।

समय निकलता गया, स्व. शर्मा के पोते भवानीशंकर शर्मा ने अपने दो पुत्रों विक्रम और विकास के साथ मिलकर पवई में अपनी बिजनेस यूनिट और कार्पोरेट ऑफिस बनाया है। भवानीशंकर ने 1969 में बिजनेस के क्षेत्र में प्रवेश किया और 1980 तक वे पवई के पहाड़ी क्षेत्रों में अधिग्रहण और क्रशिंग का काम करने लगे। 1983 में उन्होंने दो पार्टनर के साथ मिलकर डामर यूनिट लगाई और पीडब्ल्यूडी, म्युनिसिपल कॉरपोरेशन व पोटर्स से सड़क कार्य के ठेके लेने लगे। जल्द ही उनके दोनों पार्टनर भारत छोड़कर चले गए, लेकिन भवानीशंकर सुप्रीम अस्फाल्ट लिमिटेड (एसएएल) के बैनर तले मुख्यत: सड़क निर्माण के छोटे-छोटे काम लगातार करते रहे। 1998 में टर्निंग प्वाइंट आया, जब मुंबई यूनिवर्सिटी से बीई सिविल की डिग्री लेकर 35 वर्षीय विक्रम ने एसएएल ज्वॉइन की। हालांकि, शुरुआत में वे रोड सैक्टर में ही अटके रहे, फिर उन्होंने बड़ी-बड़ी कंसट्रक्‍शन कंपनियों के लिए सब-कॉन्ट्रेक्टर के रूप में पुल, ड्रेनेज आदि बनाने का काम करना शुरू किया।

विक्रम के अनुसार, जिन्होंने एमएसआरडीसी के लिए अमरावती में सड़क और पुल, मुंबई में वेस्टर्न एक्सप्रेस हाईवे का निर्माण और चौड़ीकरण, मरीन ड्राइव से लेकर नरीमन प्वाइंट तक समुद्री दीवार और ट्रेटापॉड्स बिछाने जैसे बड़े काम किए, 2002 में कंपनी का नाम बदलकर सुप्रीम इंफ्रास्ट्रक्चर इंडिया लिमिटेड (एसआईआईएल) कर दिया गया। शुरुआती पांच साल यानी 2006 तक कंपनी दूसरों द्वारा लिए गए बड़े-बड़े प्रोजेक्ट में सब-कॉन्ट्रेक्टर के रूप में ही काम करती रही। लेकिन भविष्य में बड़े प्रोजेक्ट के लिए बोली लगाना और उन्हें हासिल करना हमारे लिए बहुत महत्वपूर्ण था और बड़े खेल के लिए ऐसा करना जरूरी भी। एसआईआईएल ने सदभाव इंजीनियरिंग के लिए कॉन्ट्रेक्टर के तौर पर भिवंडी-नाशिक फोर लेन हाईवे का भी निर्माण किया। इसके बाद एसआईआईएल ने पवई में रेडी मिक्स कॉन्क्रीट (आरएमसी) यूनिट की स्थापना की, जो कि उनके आगे बढ़ने में एक सीढ़ी की तरह थी। डामर और आरएमसी यूनिट का इस्तेमाल हाउस प्रोजेक्ट में हो रहा है। वर्तमान में प्रतिदिन 510 टन क्षमता वाले तीन क्रशर प्लांट, प्रति घंटे 300 टन क्षमता वाले दो डामर यूनिट, छह आरएमसी और एक वेट मिक्स प्लांट चलाने वाले विक्रम कहते हैं कि इन सब की बदौलत हमें बहुत कम दामों पर कच्चा माल आराम से मिल जाता है। कच्चे माल की सस्ती दरों पर उपलब्धता से कंपनी को तीन से चार फीसदी फीसदी मार्जिन का अतिरिक्त लाभ मिल रहा है।

वर्ष 2006-07 में 31 वर्षीय विकास ने फाइनेंस में एमबीए डिग्री हासिल करने के बाद पारिवारिक बिजनेस को ज्वॉइन किया। विक्रम-विकास की जोड़ी ने नई जमीन तलाशना शुरू की और एसआईआईएल के पुराने कौशल और मजबूत साख की बदौलत बड़े-बड़े प्रोजेक्ट्स में बोलियां लगाना शुरू किया। इसी साल कंपनी ने अपनी 25 फीसदी हिस्सेदारी बेचकर 108 रुपए प्रति शेयर के आईपीओ के जरिए 37 करोड़ रुपए जुटाए। कंपनी 190 रुपए पर लिस्टेड हुई। पिछले पांच सालों में एसआईआईएल ने काफी तेज गति से तरक्की की है। 2010 में कंपनी का राजस्व कम्पाउंडेड एनुअल ग्रोथ रेट (सीएजीआर) 63 फीसदी बढ़कर 533 करोड़ रुपए पर पहुंच गया और कंपनी को कर पश्चात 39 करोड़ रुपए का शुद्ध लाभ हुआ।

सु्प्रीम इंफ्रास्‍ट्रक्‍चर का 50 करोड़ से 500 करोड़ रुपए तक का यह सफर महज पांच सालों का है। जब से कंपनी ने अपने को सड़क, पुल, पावर ट्रांसमिशन, बिल्डिंग और अन्य क्षेत्रों में डाइवर्सीफाइड किया है, तब से इसकी तरक्की लगतार हो रही है। विकास के अनुसार एसआईआईएल की प्रगति बड़ी ही ऐतिहासिक है, पहले हम केवल बिल्डिंग, रोड और पुल जैसे छोटे प्रोजेक्ट के ऑर्डर लिया करते थे, फिर धीरे-धीरे हमनें 100 करोड़ रुपए तक के प्रोजेक्ट के लिए बोली लगाना शुरू किया। इसके तहत हमने सबसे पहले ठाणे म्युनिसिपल्टी के लिए 113 करोड़ रुपए का स्ट्रोम वाटर ड्रेन डवलपमेंट वर्क किया। इसके बाद 103 करोड़ रुपए का एनएचएआई का चित्रदुर्गा सेक्शन कार्य पूर्ण किया। इन प्रोजेक्ट की वजह से हमें अच्छा अनुभव और आत्मविश्वास मिला, जिसकी वजह से हम हाई वेल्यू प्रोजेक्ट जैसे फ्लाईओवर, रेलवे और लॉ कोस्ट हाउसिंग प्राप्त कर सके। हमने अपनी रियल एस्टेट डवलपमेंट कंपनी भी स्थापित की है।

लय में आने के बाद शर्मा बंधु अब नए क्षेत्र जैसे पावर, टीएंडडी और रेलवे के बड़े प्रोजेक्ट लेने के लिए आक्रामक रूप से बोली लगा रहे हैं। विक्रम के अनुसार इसकी वजह से कंपनी की ऑर्डर बुक पिछले 24 माह में छह गुना बढ़कर 576 करोड़ से वर्तमान में 3500 करोड़ पर पहुंच गई है। एसआईआईएल के पास पुल, रोड और रोपवे सेगमेंट में 824 करोड़ रुपए के तीन बीओटी प्रोजेक्ट हैं। इतना ही नहीं एनएचएआई से लगभग 1300 करोड़ रुपए का वर्क ऑर्डर भी हासिल हुआ है। जून 2010 में कंपनी ने पीडब्ल्यूडी के साथ एक एग्रीमेंट किया है, जिसके तहत वह 430 करोड़ रुपए के प्रोजेक्ट के तहत स्टेट हाईवे नंबर 34 और 35 को फोर लेन में परिवर्तित करेगा। चालू वर्ष में पावर सैक्टर में कंपनी ने महाराष्‍ट्र स्टेट इलेक्ट्रिसिटी डिस्ट्रीब्यूशन कॉरपोरेशन से 375 करोड़ रुपए का पावर डिस्ट्रीब्यूशन ईपीसी कॉन्ट्रेक्ट हासिल किया है। इसके अलावा कंपनी के पास एमएमआरडीए के लिए लॉ कोस्ट हाउसिंग, पवई में एक आईटी पार्क, पंजाब के कपूरथला ज्यूडिशियल कोर्ट कोम्प्लेक्स जैसे प्रोजेक्ट भी हैं। सुप्रीम इंफ्रास्ट्रक्चर इंडिया लिमिटेड की सब्सिडियरी सुप्रीम हाउसिंग एंड होस्पिटेलिटी लिमिटेड पवई में 116 करोड़ रुपए की लागत से 25 लाख वर्ग फीट क्षेत्रफल में सुप्रीम सिटी का निर्माण कर रही है। यहां व्यवसायिक स्थान, फाइव स्टार होटल, विला और अपार्टमेंट होंगे। पहले चरण में यहां आईटी और बिजनेस पार्क बनकर तैयार हो चुका है और कई मल्टी नेशनल कंपनियों ने अपना काम भी यहां से शुरू कर दिया है। शर्मा बंधुओं को पूरा विश्वास है कि पैसे के बढ़ने से वे अपने सभी प्रोजेक्ट समय पर पूरे कर लेंगे।

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