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February 24, 2011

जयपुर: जमीन-जायदाद के धंधे में काला धन

राजस्‍थान की राजधानी जयपुर में यदि आयकर विभाग बड़ी मात्रा में काला धन पकड़ना चाहता हो तो जमीन-जायदाद से बेहतर शायद ही कोई स्‍त्रोत हो। यूं तो सरकार की नजर स्विटजरलैंड सहित अनेक देशों में भारतीयों के जमा काले धन पर लगी है लेकिन देश में ही अभी इतना काला धन है, जिसके बाहर आने से सरकार को काफी बड़ा फायदा हो सकता है।

जयपुर में यदि आप कोई मकान, प्‍लाट, फ्लैट, कॉमर्शियल प्रॉपर्टी खरीदना चाहते हैं और आपके पास पूरी कीमत नकद में है तब तो आपको शायद ही कोई दिक्‍कत हो और आप जमीन जायदाद आराम से खरीद सकते हैं। हालांकि, इसके तहत प्रॉपर्टी की जो रजिस्‍ट्री होगी वह डीएलसी दर से ज्‍यादा की नहीं होगी, भले ही आपने प्रॉपर्टी इस दर से कितनी ही ऊंची दर पर ली हो। मसलन आप जो घर खरीद रहे हैं मान लीजिए उसकी कीमत 50 लाख रुपए है तो आपको इसका तकरीबन 50 फीसदी हिस्‍सा काले धन के रुप में चुकाना होगा। डीएलसी दर से ज्‍यादा की रजिस्‍ट्री कराने को कोई भी बिकवाल वहां तैयार नहीं है। आप जिस प्रॉपर्टी को खरीदना चाहते हैं उसकी सारी राशि एक नंबर यानी चैक पेमेंट की बात करें तो प्रॉपर्टी डीलर और बिकवाल दोनों उखड़ जाएंगे। वे आपसे पूछ सकते हैं कि आप जयपुर में पहली बार जमीन जायदाद खरीदने आए हैं क्‍या। एक नंबर में सारा पैसा कैसे ले सकते हैं। यह सौदा नहीं हो सकता है। लेना है तो सोच लीजिए, दो नंबर में पेमेंट करना ही होगा। प्रॉपर्टी डीलर तो अपनी सारी फीस जो प्रॉपर्टी कीमत की अधिकतम दो फीसदी होती है, बगैर रसीद और बगैर चैक के ली जाती है। इस आय को कोई भी प्रॉपर्टी डीलर शायद ही अपने बही खातों में पूरी ईमानदारी के साथ दिखाता होगा। लक्ष्‍मी है, क्‍या काली और क्‍या गोरी।

अब जिनके पास सारी राशि नकद नहीं है लेकिन बैंक या किसी वित्त संस्‍था से कर्ज लेकर प्रॉपर्टी खरीदने की हसरत रखते हैं तो समझो उनकी इच्‍छा हमेशा अधूरी ही रहेगी। बैंक नियामानुसार कर्ज देने को तैयार हैं लेकिन काले धन के ये धंधे वाले पहले तो पूरी प्रॉपर्टी की आधी कीमत नकद चाहते हैं। अब जो 50 फीसदी राशि बची है उसका जमीन की दशा में 65 से 70 फीसदी और निर्माण हो चुकी प्रॉपर्टी का 85 फीसदी तक कर्ज मिलेगा। यानी खरीददार को इस 50 फीसदी काले धन के अलावा कर्ज को उठाने के लिए उसका हिस्‍सा भी जुटाना होगा। इसका मतलब यह हुआ कि कर्ज लेकर प्रॉपर्टी खरीदने वाले को प्रॉपर्टी कीमत की 70 फीसदी राशि नकद जुटानी होती है। इस तरह यह राशि प्रॉपर्टी बेचने वाले के हाथ में काले धन के रुप में पहुंचती है। सरकार को डीएलसी दर के जो कर हैं, वे मिल जाते हैं और आयकर विभाग को भी इसी पर कर मिल जाता है लेकिन बहुत बड़े काले धन का कोई हिसाब किताब नहीं। आयकर विभाग को सख्‍ती कर प्रॉपर्टी के बिकवालों से रजिस्‍ट्री के समय डीएलसी रेट पर प्रॉपर्टी की कीमत अदा कर प्रॉपर्टी को अपने कब्‍जे में लेना चाहिए और फिर इसे नीलामी के माध्‍यम से बेचना चाहिए। यदि आयकर विभाग ऐसे केवल 100 मामले भी खड़े कर दें तो जयपुर में ही नहीं समूचे राजस्‍थान में हड़कम्‍प मच जाएगा और प्रॉपर्टी के दाम नीचे आने के साथ काले धन के खिलाडि़यों को सांप सूघ जाएगा। साथ ही प्रॉपर्टी खरीददार को बगैर कोई नुकसान पहुंचाए उसे भरोसे में लेकर प्रॉपर्टी बिकवाल पर छापे मारने चाहिए एवं काले धन को जब्‍त करना चाहिए। प्रॉपर्टी डीलरों के बहीखाते चैक होने चाहिए कि वे साल भर में कितना कारोबार करते हैं एवं आयकर भर रहे हैं या नहीं।

February 14, 2011

सेबी को मीडिया की भूमिका की भी जांच करनी चाहिए

भारतीय शेयर बाजार में आई तीन हजार अंकों की गिरावट के पीछे क्‍या क्‍या कारण थे, इनकी जांच करने का जिम्‍मा सेबी निभाएगी। सेबी का मानना है कि ताजा गिरावट के पीछे कुछ न कुछ गड़बड़ी है। खबरों के मुताबिक सेबी ब्रोकरेज कंपनियों, विदेशी संस्थागत निवेशकों (एफआईआई) और म्युचुअल फंड जैसी 25 फर्मों की जांच कर रहा है। शुरूआती जांच से मंदडि़यों के बीच साठगांठ के कम-से-कम तीन मामलों का पता चला है। इकानॉमिक टाइम्‍स की खबर के मुताबिक मंदडि़या आपस में मिलकर कुछ शेयरों का बाजार तोड़ते हैं। यह काम वे या तो खुद उन शेयरों को शेयरों की लिवाली के लिए या फिर कंपनी के व्यावसायिक प्रतिद्वंद्वियों के इशारे पर करते हैं। उल्लेखनीय है कि पांच नवंबर को बॉम्‍बे स्‍टॉक एक्‍सचेंज का सेंसेक्स 21004 अंक की रिकॉर्ड ऊंचाई पर पहुंचने के बाद से यह तीन हजार से अधिक अंक या 15 फीसदी नीचे आ गया है।

सेबी ने जो कदम उठाया है वह प्रशंसा के योग्‍य है। शेयर बाजार के दो प्रमुख प्‍लेयर तेजडि़यों और मंदडि़यों की जांच के अलावा एक और पक्ष मीडिया की भी जांच की जानी चाहिए। यह सही है कि बाजार में पिछले कुछ दिनों से काफी नकारात्‍मक खबरों की बाढ़ आ गई थी। महंगाई दर बढ़ने से लेकर टू जी स्‍पेक्‍ट्रम घोटाले की आंच ने बाजार को गिराया। अमरीका से लेकर यूरोप तक शेयर बाजारों के सुधरने से विदेशी निवेशकों ने अपना पैसा यहां से निकाला। लेकिन, भारत की विकास स्‍टोरी जारी रहने और आर्थिक महासत्ता की ओर बढ़ने का पक्‍का दावा होने के बावजूद बाजारों के साफ होने का भय जिसने खड़ा किया उस मीडिया एवं इक्विटी विश्‍लेषकों को इस जांच के दायरे में लेना चाहिए।

प्‍याज के दाम आसमान पहुंचे,आम आदमी को प्‍याज नहीं मिल रहा, जबकि सब्जियों और फलों के दाम भी उतनी ही तेजी से बढ़े थे। लेकिन इस पर हल्‍ला मचाने के बजाय केवल प्‍याज पर ऐसा हल्‍ला मचाया गया मानों भारत का एटम बम्‍ब चोरी होकर पाकिस्‍तान पहुंच गया हो। आज प्‍याज बुरी तरह टूट चुका है और किसान काफी निराश है तो इस पर किसी मीडिया हाउस ने मुंह तक नहीं खोला कि किसानों को कम से कम वाजिब भाव तो दो। महंगाई दर बढ़ी तो जमकर हल्‍ला मचाया। जब हम विकास कर रहे हैं और हमारी जीडीपी आठ फीसदी पार हो रही है,जीवन शैली बदल रही है, आय बढ़ रही है और खर्च बढ़ रहे हैं लेकिन उत्‍पादन मांग को पूरा नहीं कर सकता तो महंगाई बढ़नी ही है। क्‍या घोटोले अमरीका,यूरोप या अन्‍य देशों में नहीं होते, अमरीका में अकेले मेडाफ ने क्‍या किया। उसके घोटाले का साइज देखिए। टू जी स्‍पेक्‍ट्रम के आबंटन में गड़बड़ हुई है और दोषियों को सजा मिलनी चाहिए। लेकिन जिस तरह इस घोटोले की आड़ में शेयर बाजार को तोड़ा गया, वह सही नहीं है। असल में मीडिया ने हर नेगेटिव खबर को एक हथौड़े की तरह चलाया और 24 घंटों की मार ने निवेशकों का मनोबल तोड़ दिया।

क्‍या मीडिया में बैठे सारे लोग वित्तीय विश्‍लेषण बेहतर तरीके से जानते हैं, सेबी को यह जानना चाहिए और इस संबंध में एक मार्गदर्शिका बनानी चाहिए। सेबी को एक परीक्षा लेकर सर्टीफाइड लेखक का प्रमाण पत्र देना चाहिए। अब यहां हल्‍ला मचेगा कि यह प्रेस की आजादी पर हल्‍ला है या अभिव्‍यक्ति के अधिकार का हनन है। प्रेस की आजादी या अभिव्‍यक्ति की आजादी का मतलब यह नहीं कि कुछ भी न्‍यूज में जाए। मनमानी चले और समाचारों को किसी भी ढंग से पेश किया जाए। आजादी के लिए अनुशासन जरुरी है। एक पंडित जी गाय का बछड़ा कंधे पर रखकर लेकर जा रहे थे। कुछ चालक लोगों ने उस बछड़े को हड़पने की सोची। वे लोग बीच बीच में पंडित जी से मिलते गए और कहते गए कि यह बकरा कहां से उठा लाए। पंडित हर बार कहते रहे कि यह गाय का बछड़ा है लेकिन जब उन्‍हें लगभग 50 लोगों ने टोक दिया कि यह बकरा है तो वे हार गए और उस बछड़े को नीचे गिराकर चल दिए। यही होता है कि खबरों की मार का असर।

जब शेयर बाजार टूट रहा था तो क्‍यों कई अखबारों, टीवी चैनलों और वेबसाइटों ने शेयरों की खरीद के कॉल दिए। इन अंर्तयामियों (इक्विटी विश्‍लेषक) को पता था कि निफ्टी 5400-5200-4800-4200 आ जाएगा तो खरीद के कॉल किसके कहने से दिए। देश के कौने कौने में बैठे निवेशकों ने इन विश्‍लेषकों को अपना भगवान मानते हुए शेयर खरीदे और हारते गए। जब इन अंर्तयामियों को पता था तो इन्‍होंने शेयर बेचने के कॉल क्‍यों नहीं दिए। कुछ पता नही होता इक्विटी विश्‍लेषकों को। केवल दो लाइन का डिसक्‍लेमर देने से अपने अपराध से बच जाते हैं ये विश्‍लेषक। मीडिया माध्‍यमों ने क्‍या देखा नहीं कि जब इनमें कॉल पीट रहे हैं तो दिए क्‍यों जा रहे हैं। क्‍या किसी का हित साधा जा रहा था। ज्‍यादातर ब्रोकरेज घरानों और विश्‍लेषकों ने जो नुकसान पहुंचाया है और मीडिया का उपयोग किया है, सेबी को इसकी भी जांच करनी चाहिए। रोका जाना चाहिए इस तरह के कॉल देने वालों को। बाजार के भाग्‍य विधाता बनने का प्रमाण पत्र किसने इन्‍हें सौंपा। सेबी इस मुगालते में न रहे कि प्रेस लोकतंत्र का चौथा खंभा है। भारतीय संविधान में लोकतंत्र के तीन खंभों के बारे में ही कहा गया है: कार्यपालिका, न्‍यायपालिका और विधायिका। ऐसे में प्रेस किस आधार पर अपने को चौथा खंभा मानती है। सिद्ध करे कि देश के संविधान में प्रेस के बारे में इस तरह की बात कही गई है और देश के लिए संविधान से ऊपर कोई नहीं है। कल कोई भी उठकर अपने को देश का प्रधानमंत्री कह देगा तो लोग मान लेंगे क्‍या। सेबी को शेयर बाजार के तेजडि़यों और मंदडि़यों से पहले मीडिया की जांच करनी चाहिए कि तेजी मंदी में यह कैसे और कितनी भूमिका निभाता है।

February 11, 2011

शेयर बाजार के लौटेंगे अच्‍छे दिन

भारतीय शेयर बाजार के लिए वर्ष 2011 अब तक काफी खराब रहा है। लेकिन अब बाजार के लिए फिर से सकारात्‍मक खबरों की शुरुआत हो चुकी है। खाद्य महंगाई दर कम होने एवं कृषि उत्‍पादन बढ़ने से इसका आरंभ हुआ है। हालांकि, कुछ कठिनाइयों से अभी भी इनकार नहीं किया जा सकता। केवल आज सप्‍ताह के आखिरी दिन की बढ़त से पूरा मानस नहीं बदला है लेकिन बेहतर होने की शुरुआत हो गई है।

यह तो तय है कि शेयर बाजार की मौजूदा मंदी निवेशकों को भारी पड़ी है। इस साल हरेक मिनट निवेशक 100 करोड़ रुपए खोए हैं। वर्ष 2011 की शुरुआत से अब तक शेयर बाजार की सम्‍पदा 11 लाख करोड़ रुपए साफ हो चुकी है। जबकि, सेंसेक्‍स तीन हजार अंक नीचे आ चुका है। घरेलू शेयर बाजार में एक करोड़ से कुछ अधिक निवेशक हैं। इस राशि को इनमें बांटा जाए तो पता चलता है कि हरेक निवेशक ने औसतन दस लाख रुपए का नुकसान खाया है।

भारतीय बाजार किन-किन कारणों से अब बढ़ेगा और हमारे लिए क्‍या क्‍या पॉजिटिव होने जा रहा है, यह आपको लेखों की एक श्रृंखला के तहत बताया जाएगा। इसके तहत सबसे पहले होगा कृषि क्षेत्र। ताजा आंकडों पर नजर डालिए: मुख्‍य फसलों का उत्‍पादन अनुमान वर्ष 2010-11---अनाज: 23.20 करोड़ टन (चावल: 9.40 करोड़ टन, गेहूं: 8.14 करोड़ टन, मोटा अनाज: 4 करोड़ टन, मक्‍का 2 करोड़ टन)। दलहन: 1.66 करोड़ टन (तुअर 32 लाख टन, उड़द 15 लाख टन, मूंग 11 लाख टन)। तिलहन: 2.79 करोड़ टन (सोयाबीन: 1.04 करोड़ टन, मूंगफली: 68 लाख टन)। कपास 3.39 करोड़ गांठ (प्रति गांठ 170 किलो)।

कहावत है लक्ष्‍मी ने सदा धैर्यवान और साहसी लोगों का साथ दिया है। आप भी अपनी नकदी के साथ तैयार रहिए ताकि दलाल स्‍ट्रीट में आने वाली अगली जबरदस्‍त तेजी का लाभ लेने से वंचित न रह जाएं। इस श्रृंखला का पहला लेख जल्‍दी ही होगा वाह मनी पर। तब तक कहिए..वाह मनी !

February 09, 2011

परदेसी ने छोड़ा साथ, बाजार का हुआ सत्‍यानाश

तुम तो ठहरे परदेसी...साथ क्‍या निभाओगे..यह गाना इस समय शेयर बाजार पर सटीक बैठ रहा है। शेयर बाजार के फंडामेंटल और तकनीकी विश्‍लेषकों के साथ सरकारी एजेंसियों के कर्ता धर्ता भी यह कहते रहे कि इंडिया ग्रोथ स्‍टोरी, इंडिया शाइनिंग, मेरा भारत महान...आप देखते जाइए कि विदेशी निवेशक यहां से भाग नहीं पाएंगे। विदेशी पैसे के आगमन को लेकर निवेशक चिंता न करें, पैसा लगातार आता रहेगा। निवेशक चैन की नींद सोएं। लेकिन ताजा आंकडें देखिए...इन्‍हीं निवेशकों ने भारत सहित सभी उभरते बाजारों का सत्‍यानाश कर दिया। ताजा आंकडे देखिए...2 फरवरी 2011 को समाप्‍त सप्‍ताह में इन निवेशकों ने सात अरब डॉलर निकाल लिए। बीते तीन सालों में बाजार से निकाली गई यह सबसे ज्‍यादा रकम है। इस राशि में 4.6 अरब डॉलर की राशि एक्‍सचेंज-ट्रेडेड फंड से निकाली गई रकम है। भारतीय बाजार से इन निवेशकों ने 20.7 करोड़ डॉलर की राशि निकाली है जो जून 2010 के बाद सबसे अधिक है।

अभी यह निकलती राशि थमने का नाम नहीं ले रही है। 2 फरवरी के बाद भी बाजार लगातार गिरते जा रहा है। गिरावट जहां जाकर थमेगी, वहां पता चलेगा कि भारत सहित उभरते बाजारों से परदेसियों ने कितना पैसा निकाल लिया। हमारी और हमारे बाजारों की यह नियति बन गई है कि अपने पैसे के बजाय हम दूसरों के पैसे से आगे बढ़े। विदेशी निवेशकों पर बाजार को पूरी तरह निर्भर कर दिया, जबकि घरेलू संस्‍थागत निवेशकों को ऐसे में आगे आकर बाजार को संभालना चाहिए था यदि वाकई इंडिया ग्रोथ स्‍टोरी सही है तो। भारत के प्रति भरोसा है कि हम वाकई तेजी से तरक्‍की कर रहे हैं और कुछ भी गड़बड़ नहीं है तो घरेलू संस्‍थागत निवेशक क्‍यों शेयर बेच रहे हैं या किसके इशारे पर शेयर बेच रहे हैं। अथवा घरेलू संस्‍थाग‍त निवेशक भी यह मानते हैं कि परदेसियों के बगैर हमारे बाजार को कोई माई बाप नहीं है। केवल बढ़ती महंगाई को बाजार पर पड़ रही मार के दोषी ठहराना सही नहीं है। जब हमारी जीडीपी जवाहर लाल नेहरु जी के जमाने की 2.25 फीसदी से बढ़कर आठ फीसदी पहुंच गई। हमारी जीवन शैली में तब से अब तक जमीन-आसमान का अंतर आ गया। हमारी प्रति व्‍यक्ति आय कहां से कहां पहुंच गई और साथ ही जनसंख्‍या तो महंगाई का बढ़ना कुछ हद तक सही भी है। लेकिन इस समय अधिकतर विश्‍लेषक महंगाई दर को लेकर इस तरह निवेशकों को डरा रहे हैं जैसे मीडिया की खबरों के मुताबिक 2012 में धरती साफ हो जाएगी और बाद में सतयुग की शुरुआत होगी।

निवेशक एक बात साफ ध्‍यान रखें कि वर्ष 2008 की शुरुआत में जो गिरावट शुरु हुई थी उसके बाद सेंसेक्‍स आठ हजार के स्‍तर से नीचे चला गया था लेकिन इक्विटी विश्‍लेषकों ने निवेशकों को मीडिया में इस तरह गुमराह किया कि वे कोई शेयर खरीद ही नहीं सके। ये विश्‍लेषक मानते थे कि सेंसेक्‍स तीन हजार अंक के करीब आ जाएगा लेकिन 8500 के बाद सेंसेक्‍स ने पलटकर नहीं देखा एवं फिर से 21 हजार की ऊंचाई को छू लिया। अब फिर बाजार फिसल पट्टी पर है। निवेशक खुद अपनी पढ़ाई और ज्ञान के आधार पर बेहतर कंपनियों का चयन कर छोटी छोटी मात्रा में खरीद करें जिससे न उनकी लागत कम रहेगी बल्कि बाजार के बढ़ने पर उनको बेहतर शेयर खरीद पाने का मलाल भी नहीं होगा। ध्‍यान रखें कि दूसरों के ज्ञान से भरपूर पैसे नहीं कमाए जा सकते। यदि ऐसा होता तो ये तथाकथित विश्‍ेलषक अरबपति होते और उनके पास खजाने की चाबी बताने का समय नहीं होता। शेयर बाजार में आज भी कुछ ऐसे खिलाड़ी हैं जो बेहद बड़ी भूमिका निभाते हैं लेकिन अब तक न तो वे किसी टीवी पर आए, न अखबारों में उनका इंटरव्‍यू आया और न ही किसी वेबसाइट पर चमके। इनके पास काम से फुर्सत नहीं है लेकिन फुर्सतिया विश्‍लेषक अपना महान ज्ञान एक चार्ट सॉफ्टवेयर को सामने रखकर बांटने आ जाते हैं। मंदी में मंदी और तेजी में तेजी यानी भारतीय नेताओं की तरह आयाराम-गयाराम।

February 08, 2011

दलाल स्‍ट्रीट: रिटेल इनवेस्‍टर है कौन


दलाल स्‍ट्रीट के बारे में 4 फरवरी 2011 को पोस्‍ट में लिखा था कि दलाल स्‍ट्रीट: डे ऑफ डिपार्चर...। दलाल स्‍ट्रीट में चल रही गिरावट पर रोज जो खबरें आती हैं उनमें यह होता कि फंडों के साथ रिटेल इनवेस्‍टर शेयरों को बेच रहे हैं जिससे यह गिरावट थमने का नाम नहीं ले रही। हालांकि, जब बाजार में हर रोज सकारात्‍मक खबरें आ रही थीं तब भी रिटेल इनवेस्‍टरों की कोई बड़ी खरीद नहीं थी।

रिटेल इनवेस्‍टर रिलायंस पावर के आईपीओ के बाद हुई पिटाई को आज तक भूल नहीं पाए हैं जिसकी वजह से इन इनवेस्‍टरों ने मंदी के उबरने के बाद आई तेजी में न तो ज्‍यादा शेयर खरीदें और न ही इन्‍हें अब तक रख पाए। ये निवेशक तो सेंसेक्‍स के 19 हजार के बाद और 21 हजार पहुंचने से पहले ही अपने शेयर बेच चुके थे और केवल तमाशाबीन बने हुए थे। केवल सेंसेक्‍स के बढ़ने और घटने का आनंद ले रहे थे इस अफसोस के साथ कि वे पैसा कमा न सके। लेकिन अब जब बाजार रोज पीट रहा है वे खुश हैं कि अच्‍छा हुआ बच गए। पिछली पिटाई से अब तक की बढ़त में कितने करोड़ों के शेयर रिटलेरों ने खरीदे, यह जानना सेबी के लिए कोई कठिन काम नहीं है।

इन निवेशकों से पूछो तो पता चलेगा कि उनके पास काफी कम संख्‍या में शेयर हैं जिसे वे या तो बेचना नहीं चाहते या कहते हैं कि पड़े भी रहेंगे तो अफसोस नहीं है। लेकिन अब सवाल यह उठता है कि आखिर ये रिटेल निवेशक हैं कौन। दलाल स्‍ट्रीट में चल रही चर्चा को सुने तो यह अटकल भी हो सकती है और सच्‍चाई भी। जो जांच का विषय है...इन छोटे और कम ज्ञानी निवेशकों से यह पूछो कि रिटेल निवेशक बेच रहे हैं तो कहेंगे अपने देश के नेता और जिन ब्‍यूरोक्रेट का दो नबंर का पैसा लगा है वे शेयर बेच रहे हैं। साब हमारे पास शेयर हैं कहां जो बेचें। सरकार काले धन के पीछे पड़ रही है, विरोधी दल भी इस मुद्दे पर कमर कस रहे हैं। मीडिया में काले धन वालों के नाम आने लगे हैं। ऐसे में जिन लोगों ने काला धन शेयर बाजार में लगा रखा है कि वे कुछ होने से पहले अपना माल निकाल लेना चाहते हैं।

सरकार पहले भी कई बार यह आशंका जता चुकी है कि आतंककारियों का भी पैसा शेयर बाजार में आया है लेकिन इसके कोई पुख्‍ता सबूत नहीं मिले और न ही कार्रवाई हुई। सेबी को हर रोज के बिकवाली डॉटा में यह देखना चाहिए कि विदेशी संस्‍थागत निवेशकों, घरेलू संस्‍थागत निवेशकों और म्‍युचुअल फंडों के अलावा रिटेल के नाम पर जो बिकवाली हो रही है, वे वाकई कौन हैं। उनके धन का स्‍त्रोत क्‍या है। रिटेल इनवेस्‍टरों के नाम पर लाभ उठाने वाला असली खिलाड़ी कोई और तो नहीं है। ऐसे कई किस्‍से बाजार में चलते हैं कि आप अपना डिमैट खाता, चैक बुक दूसरों को यूज करने दीजिए, यूज करने वाला ही सारे चार्ज अदा करेगा। आप पर्दे के आगे और पर्दे के पीछे दूसरा खिलाड़ी। कई लोगों का स्‍थाई पता ठिकाना नहीं होता, मुंबई जैसे महानगर में झोपड़े में रह रहे हैं लेकिन उनके खाते यूज कर प्‍लेयर सारा गेम प्‍ले कर रहे हैं और झोपड़ावासी बगैर मेहनत के तथाकथित रिटेलर हैं।

February 04, 2011

दलाल स्‍ट्रीट: डे ऑफ डिपार्चर


इजिप्‍त (मिस्त्र) में 30 साल से शासन में जमे होस्‍नी मुबारक के खिलाफ जनता का डे ऑफ डिपार्चर शुरु हो गया है। यमन, सीरिया के भी हालात ठीक नहीं है। टयूनिशिया से शुरु हुई चिंगारी ने दस देशों की जनता को जगा दिया है। भारत की जनता अभी जागी नहीं है लेकिन दलाल स्‍ट्रीट जाग गई है। इजिप्‍त और सीरिया की गंभीर स्थिति को समझते हुए दलाल स्‍ट्रीट में आज आई जोरदार बिकवाली ने भारतीय शेयर बाजार के रिकॉर्ड में दर्ज ब्‍लैक फ्राइडे में एक और शुक्रवार को जोड़ दिया।

बॉम्‍बे स्‍टॉक एक्‍सचेंज का सेंसेक्‍स आज 18450.07 अंक पर खुला और ऊपर में 18542.20 अंक आया। यह नीचे में 17926.98 अंक गया। यह अंत में 441.16 अंक गिरकर 17926.98 अंक पर बंद हुआ। बीएसई मिडकैप इंडेक्‍स 93.35 अंक घटकर 6734.52 अंक पर निपटा। बीएसई स्‍मॉल कैप इंडेक्‍स 132.80 अंक कमजोर पड़कर 8331.20 अंक पर बंद हुआ। नेशनल स्‍टॉक एक्‍सचेंज की निफ्टी 137.80 अंक फिसलकर 5388.95 अंक पर बंद हुई।

जागी जनता शुक्रवार, शनिवार और रविवार को इजिप्‍त, सीरिया में क्‍या गुल खिला देगी, कोई नहीं जानता। यदि यहां अशांति बढ़ी तो शेयर बाजार की परेशानियां कम नहीं होगी लेकिन इजिप्‍त में मुबारक शांति के साथ सत्ता हस्‍तांतरण कर देते हैं और वहां अराजकता नहीं फैलती है तो दुनिया चैन की सांस लेगी। अमरीका इजिप्‍त के अधिकारियों के साथ मुबारक को हटाने का समझौता तैयार कर रहा है। अमरीका में राष्ट्रपति बराक ओबामा का प्रशासन ऐसे ही एक समझौते को अंतिम रूप देने की कोशिशों में जुटा है जिसके तहत इजिप्‍त के कई वरिष्ठ नेताओं से भी बातचीत चल रही है। ऐसा होता है तो यह तय है कि सोमवार 7 फरवरी 2011 को दलाल स्‍ट्रीट में बेहतर बाउंस बैक होगा, रौनक लौट आएगी अन्‍यथा कम से कम अगले दो महीने खराब ही रहेंगे। इजिप्‍त की शांति नेशनल स्‍टॉक एक्‍सचेंज की निफ्टी को 5700 से 5800 के करीब इस महीने के अंत तक ले जा सकती है। अन्‍यथा, आज का दिन भारतीय शेयर बाजार के लिए भी डे ऑफ डिपार्चर होगा जो निफ्टी को आठ सौ से एक हजार अंक और नीचे उतार सकता है।

इजिप्‍त में होस्‍नी मुबारक भी अमरीका के खास आदमी है और अमरीका की अगुवाई में बन रहे समझौते में भी वही आदमी इजिप्‍त की बागड़ोर संभालेगा जो अमरीका का पिछलग्‍गू बना रहे। अमरीका अब इजिप्‍त में अपनी पकड़ और मजबूत बनाकर इस्‍लामिक देशों की गर्दन नापना चाहता है। टयूनिशिया के भागे राष्‍ट्रपति भी अमरीका के रहमोकरम से ही शासन कर रहे थे। अमरीका अपनी अर्थव्‍यवस्‍था को सुधारने और इस्‍लामिक राष्‍ट्रों को डांवाडोल करने के लिए एक के बाद एक देश को नापेगा। इन देशों में सीरिया, जार्डन, ईरान, सउदी अरब, अलजीरिया, तजाकिस्‍तान, बेलारुस, यमन, जिम्‍बॉबे, सूडान शामिल है।

इराक और अफगानिस्‍तान में अमरीका पहले ही अपनी पैठ बना चुका है लेकिन इराक के तेल भंडार पर कब्‍जा करने के अलावा उसे इन दो देशों में कोई खास फायदा नहीं हुआ। लेकिन इस बार जिन जिन देशों की वह गर्दन नापना चाहता है उससे उसे भौगोलिक, राजनीतिक और आर्थिक लाभ होगा। अमरीकी डॉलर मजबूत होगा और दुनिया भर का पैसा फिर अमरीका लौटेगा जिससे वहां की मरी अर्थव्‍यवस्‍था में जान आएगी। इन इस्‍लामिक देशों के बाद अमरीका ब्रिक देशों यानी ब्राजील, रुस, भारत और चीन की अर्थव्‍यवस्‍थाओं को नुकसान पहुंचाने की तैयारी करेगा।

इन बिक्र देशों के बाजारों पर अमरीकी कंपनियों की पकड़ मजबूत न हुई तो यहां अमरीका साम, दाम, दंड और भेद का इस्‍तेमाल कर अपनी ताकत बढ़ाएगा। यह वही अमरीका है जिसने एशियन टाइगरों को टाइगर-टाइगर कहकर खूब चढ़ाया और बाद में उनकी हालत चूहे जैसे कर दी। भारत को सचेत रहने की जरुरत है क्‍योंकि हर विदेशी इंडिया शाइनिंग, इंडिया ग्रोथ स्‍टोरी, इमर्जिंग मार्केट कह कहकर कहीं चने के झाड पर तो नहीं चढ़ा रहे। हम ग्रोथ करें, आगे बढ़े, लेकिन सचेत होकर अन्‍यथा यहां के शासकों को भी डे ऑफ डिपार्चर का सामना करना पड़ सकता है और यह हर कोई जानता है कि महात्‍मा गांधी ने अंग्रेजों को ऐसा ही डिपार्चर...भारत छोड़ो करवाया था।

February 02, 2011

भ्रष्‍टाचार, भूख ने हिलाए दस देशों के सिंहासन

हाउस ऑफ साउद
लोकतंत्र के इस दौर में क्या आप कल्पना कर सकते हैं कि कोई राजपरिवार 100 सालों तक सत्ता पर काबिज रहे। दुनिया के 25 फीसदी तेल स्रोतों पर कब्जा रखने वाले सऊदी अरब में ऎसा ही है। इस राजपरिवार में तकरीबन सात हजार हजार सदस्य हैं। लेकिन देश के हालात हर दिन बदतर होते जा रहे हैं। आंकड़ों के मुताबिक यहां हर साल 10 फीसदी की दर से बेरोजगार बढ़ रही है। सात में में एक नौजवान निरक्षर है। सबसे बुरी हालत तो महिलाओं की है जो तमाम तरह की पाबंदियों में जिंदा रहती हैं। यहां भी कुछ हलकों से आजादी और सुशासन की मांगें उठनी शुरू हो चुकी हैं।


अब्देलअजीज
ये 1999 से अल्जीरिया में राज कर रहे हैं। अपने खिलाफ हर आवाज दबा देने में माहिर। इज्पित के जनआंदोलन से प्रेरणा लेकर जनता उतरी सड़कों पर।

होस्नी मुबारक
इजिप्‍त के बेहद शक्तिशाली और पिछले 31 सालों से सत्ता पर काबिज राष्ट्रपति मुबारक के खिलाफ भड़का विद्रोह अब कभी भी निर्णायक रूप ले सकता है।

किम जोंग इल
उत्तर कोरिया का क्रूर शासक। शासनकाल में दो लाख लोग मारे और इतने ही जेलों में ठूंस दिए गए। अब किम के खिलाफ आवाजें उठनें लगी हैं। पुत्र मोह के आरोप भी।

हसन अल बशीर
सूडान का तेज दिमाग शासक। 1989 में एक विद्रोह का नेतृत्व करने के बाद सत्ता पर काबिज। अब उनकी सरकार अपनी अंतिम सांसे गिनती प्रतीत होती है। दक्षिण सूडान का बनना हुआ तय।

रॉबर्ट मुगाबे
जिम्बॉबे का तानाशाह। 1980 में जिम्बॉबे आजाद हुआ और तभी से सत्ता पर कब्जा। विपक्षी दलों के नेताओं को या तो मरवा दिया या फिर जेल में ठूंसा।

अब्दुल सलेह

यमन के 32 सालों से शासक। कुशासन और दमन के अलावा भ्रष्टाचार के आरोप, कभी भी जा सकती है सत्ता। लोगों में काफी गुस्सा।

लुकाशेंको
बेलारूस के एलेक्झेंडर लुकाशेंको को यूरोप का आखिरी तानाशाह कहा जाता है। 16 सालों से शासक। अब तेजी से बढ़ता दबाव।

अहमदीनेजाद
ईरान के राष्ट्रपति चुनाव जीतकर सत्ता में आने का दंभ लेकिन देश में देश-विेदेश में खराब फिजा। प्रतिबंधों से देश पतन की कगार पर आया।

इमोमाली रामोन
तजाकिस्तान को आजादी मिली 1992 में। इसके ठीक से सत्ता पर कब्जा। किसी समय साधन संपन्न रहा यह छोटा सा देश अब बेहद गरीब। (पत्रिका से साभार)।

February 01, 2011

जनविद्रोह की चिंगारी ज्‍वाला बनने की तैयारी में


भूखे भजन न होय गोपाला....भारत में यह कहावत बरसों से चली आ रही है। इसी भूख, महंगाई, गरीबी, भ्रष्‍टाचार और बेरोजगारी की वजह से टयूनिशिया के बरसों से जमे राष्‍ट्रपति को जान बचाकर भागना पड़ा, वही यह चिंगारी अब इज्पित में ज्‍वाला बन रही है। 30 साल से कुर्सी से चिपके राष्‍ट्रपति होस्‍नी मुबारक अंतिम दांव खेल रहे हैं कि सेना और अमरीका के सहयोग या फिर इजरायल के दबाव से वे सत्ता में बने रह जाएं लेकिन सभी सत्ताओं से ऊपर जनता ने उनको अल्‍टीमेटम दे दिया है कि खैर चाहते हो तो चुपचाप हट जाओ वरना सिर, आंख पर बैठाने वाली जनता को तुम्‍हें नीचे उतारना भी आता है। संभवत: मुबारक इजिप्‍त से भागने के बाद किस देश में रहेंगे, की भी संभावना तलाश रहे हैं। टयूनिशिया में एक जवान छोकरे ने जो चिंगारी पैदा की वह अब इजिप्‍त के अलावा अलजीरिया, जार्डन, यमन, लीबिया को भी अपनी चपेट में लेने जा रही है। इन मुस्लिम शासक देशों में बरसों से डंडे का शासन चला आ रहा है लेकिन कारण केवल शासन नहीं है, बल्कि आम जनता का जबरदस्‍त त्रस्‍त होना है। जनता को शांति से जीने नहीं‍ दिया जा रहा। महंगाई, बेरोजगारी को रोकने में ये शासक नाकाम रहे हैं और केवल अपने धन को तेजी से बढ़ाते जा रहे हैं।

इन मुस्लिम देशों में आज जो हो रहा है उससे दुनिया के दूसरे देश भी बच नहीं पाएंगे क्‍योंकि कारण कॉमन हैं। हम अपने देश भारत और पड़ौसी देश पाकिस्‍तान, बांग्‍लादेश, श्रीलंका और नेपाल की बात करें तो इन्‍हीं समस्‍याओं का सामना करना पड़ रहा है। हालांकि, भारत की जनता अन्‍य देशों की तुलना में काफी सहनशील है जिसकी वजह से जनविद्रोह जल्‍द न हो लेकिन पाकिस्‍तान और बांग्‍लादेश को इस क्षेत्र में सबसे पहले जनविद्रोह का सामना करना पड़ सकता है। संभव है पाकिस्‍तान की मौजूदा सरकार इस क्षेत्र में उखड़ने वाली पहली सरकार बने। पाकिस्‍तान में महंगाई, बेरोजगारी के अलावा चरमपंथी मुख्‍य समस्‍या हैं। नेपाल में अशांति बढ़ेगी। श्रीलंका ने लिट्टे से कुछ ही समय पहले छुटकारा पाया है और वहां विकास की रफ्तार काफी तेज है। श्रीलंकाई जनता को अब सुकून की जिंदगी जीने का मौका मिला है जिसकी वजह से वहां विद्रोह नहीं होगा।


भारत की बात करें तो देश में बड़े-छोटे प्रदर्शन संभव है, लेकिन सीधे जनविद्रोह की कोई संभावना नहीं है। यहां जनता पांच साल में एक दिन वोट डालकर सीधा विद्रोह करती है। लेकिन पांच साल जो दर्द झेलना होता है उसकी कोई सुनवाई नहीं है। संविधान ने अभिव्‍यक्ति की आजादी दी है लेकिन शासक जनता की कोई बात सुनते ही नहीं। शायद शासकों को न सुनने की आजादी मिली हुई है। जनता को अभिव्‍यक्ति की आजादी और नेताओं को न सुनने की आजादी, हो गया हिसाब बराबर। लेकिन पहले मध्‍य प्रदेश और अब बिहार में विधानसभा चुनावों में विकास ने जो भूमिका निभाई, वह एक चिंगारी ही है। मध्‍य प्रदेश में अपने को अविजित मानने वाले दिग्‍विजय सिंह को जाना पड़ा था तो बिहार में लालू प्रसाद जनता को अपना पिछलग्‍गु मानने के भ्रम में सब कुछ खो बैठे। जनता अब हर रोज एक घोटाले से अपने नेताओं की असलियत समझ रही है। सुप्रीम कोर्ट जिस तरह भूमिका निभा रही है और हर मामले में सरकार को लताड़ रही है उससे आम आदमी काफी कुछ समझ रहा है, सीख रहा है। इस बीच, देश की जनता का खाया पिया धन जो विदेशों में पहुंचा है उसका हिसाब किताब नाम सहित मांगने की जिद्द से सरकार के माथे पर बल पड़ रहे हैं। पैसा भारतीय जनता का है लेकिन नाम नहीं बताएंगे क्‍योंकि विदेशों से समझौते हैं। दो साल बाद बताएंगे, तीन साल बाद सब समाने आएगा....ताकि इस दौरान सारे पैसे और खाता धारकों को रफा दफा किया जा सके।


इजिप्‍त में विपक्षी नेता अल बारदोई भी प्रदर्शनकारियों का साथ दे रहे हैं और होस्‍नी मुबारक को फौरन सत्ता छोड़ने को कहा है। लेकिन भारत में भूख, महंगाई, गरीबी, भ्रष्‍टाचार और बेरोजगारी जैसे अहम मुद्दों पर विपक्षी दल खासकर सबसे बड़ी पार्टी भाजपा कुछ नहीं कर पा रही है। टू जी स्‍पेक्‍ट्रम के मुद्दे पर जेपीसी, जेपीसी की मांग करने के अलावा जनता से सीधे जुड़े मुद्दों पर कुछ नहीं किया। आम आदमी टू जी स्‍पेक्‍ट्रम नहीं, रोटी, सब्‍जी खाता है। वह गरीबी और भ्रष्‍टाचार से जूझ रहा है। लेकिन, भाजपा के मुखिया लाल कृष्‍ण आडवाणी जी को कैसे भी प्रधानमंत्री बनना है। बस एक बार प्रधानमंत्री बनना है लेकिन पार्टी प्रमुख गडकरी जी के बल पर। खुद क्‍यों जनमुद्दों पर गलियों की खाक छाने। रथयात्रा कर खून छान ली खाक, क्‍या हासिल हुआ। अब क्‍यों परेशान हों। आम आदमी के मुद्दे पर किसी ने भी जननेता की भूमिका नहीं निभाई। सांसद या विधायक के तौर पर वेतन व भत्तों को बढ़ाने में जितने जोर शोर से महंगाई को आगे रखकर अपना काम करवा लिया, उसकी आधी ताकत भी जनता के लिए नहीं लगाई। इमरजेंसी का लाभ यह हुआ कि होस्‍नी मुबा‍रक की तरह 1947 से 1977 तक यानी 30 साल से कुर्सी पर जमी कांग्रेस को नीचे उतरना पड़ा। फेविकॉल के जोड़ से जमी इस कांग्रेस को उतारने में भी जयप्रकाश नारायण जी की जनक्रांति की भूमिका थी लेकिन अफसोस वह आगे नहीं बढ़ सकी। जनता को भी एक लोकनायक की तलाश है जिसके मिलते ही यहां से भी कुशासकों को भागना पड़ेगा, यह तय है।